तुम्हारे बा'द दुनिया में बचा क्या है
कि अब ये ऐश-ओ-इशरत ये मज़ा क्या है
बिछड़ कर तुम से मुझ को ये समझ आया
जहाँ में इश्क़ से बढ़ कर नशा क्या है
कि एक और एक मिल कर एक बनता है
मोहब्बत में गणित का क़ायदा क्या है
सहे हैं मैं ने कितने ही सितम हँस कर
कभी ये तक नहीं पूछा ख़ता क्या है
बनाया है रक़ीबों को ख़ुदा मैं ने
ये मुझ को मत सिखाओ तुम वफ़ा क्या है
तुम्हें जो चाहते हैं सब मुनाफ़िक़ हैं
तुम इक दिन जान जाओगी दग़ा क्या है
गुनाह-ए-इश्क़ से सीखा है बस इतना
कि ज़िंदा रहने से बद-तर सज़ा क्या है
मोहब्बत की थी जब 'रेहान' मर्ज़ी से
तो फिर दिल टूट जाने का गिला क्या है
— Rehaan















