'सुनो! मैं घर वापस आ रहा हूँ'
अच्छा! तुम्हें एक ख़बर सुना रहा हूँ
सुनो! मैं घर वापस आ रहा हूँ
पूरे नौ दिनों की छुट्टियाँ मिली हैं
मगर छुट्टियाँ तो महज़ एक बहाना है
अस्ल में तो तुम से मिलना चाहता हूँ
तुम्हें रू-ब-रू देखना चाहता हूँ
इक दफ़ा फिर बाहों में भरना चाहता हूँ
अस्ल में मैं थोड़ा-सा थक गया हूँ
तुम्हारी गोद में कुछ देर सोना चाहता हूँ
सफ़र की धूप में बहुत जल चुका हूँ
ज़रा ज़ुल्फ़ों की पनाह में रहना चाहता हूँ
अंजान राहों पे बड़ा भटक लिया हूँ
तुम्हारे दिल के मकाँ में ठहरना चाहता हूँ
बस नौ ही दिन मिले हैं मुझे मरियम
हर पल तुम्हारे साथ गुज़ारना चाहता हूँ
और चाहता हूँ कि मेरा इंतिज़ार करना
ठीक वैसे ही उन हसीन शामों की तरह
उसी सफ़ेद सलवार और कुर्ती में सँवरना
और गले में लहराता वही सुर्ख़ दुपट्टा
अपनी छत की मुंडेर पर तुम खड़ी रहना
गुज़रुँगा जब मैं गली से तुम्हारी
तो रोकना न ख़ुद को तुम मुस्कुराने से
मगर इस बार फेर लूँगा नज़रें मैं तुम से
तुम भी रोक लेना ख़ुद को क़दम बढ़ाने से
है क़सम हम दोनों को उस रिश्ते की
जिस का वजूद कोई नाम कोई हैसियत नहीं
मैं ने ख़त में ऊपर लिक्खा है जो कुछ भी
उन बातों की मरियम अब कोई अहमियत नहीं
सोचो! फिर तुम्हें वो बातें क्यूँ बता रहा हूँ
सुनो! मैं घर वापस आ रहा हूँ















