“ऐ अजनबी क्यूँँ बार-बार तुम मुझे याद करती हो”
ऐ अजनबी क्यूँ बार-बार तुम मुझे याद करती हो
अपना कीमती वक़्त क्यूँ मुझ पर यूँ बर्बाद करती हो
स्वजन हो साथी हो बोलो आख़िर तुम कौन हो
अगर हो आशिक़ मेरी तो फिर तुम अबतक क्यूँ मौन हो
निश्चित ही तुम मोहब्बत के इज़हार से डरती हो
जब कहने में इतनी दिक़्क़त है तो प्यार क्यूँ करती हो
कहीं डरती तुम उस न से तो नहीं जो बयान-ए-इश्क़ पे सुनना पड़े
मोहब्बत भी पूरी न हो और नया साथी भी ढूँढ़ना पड़े
पर ये भी तो सच है ना मोहब्बत में दोस्ती सराब है
इक बार मोहब्बत हो जाए तो बस दोस्त रह पाना ख़्वाब है
ख़ैर छोड़ो ये फ़िज़ूल की बातें चलो बस इतना ही बता दो
क्यूँ कर बैठी मोहब्बत मुझ से इस राज़ से तो पर्दा हटा दो
सीधा दिल ही लगा बैठी मुझ
में ऐसा भी क्या देख लिया तुम ने
जो ख़ूबियाँ तुम ने देखी हैं काश! कभी तो देखा होता उस ने
अब पढ़ ही लिया है आँखों को मेरी तो क्यूँ न मुझ पर एक एहसान कर दो
जिस नज़रिए से तुम ने देखा है मुझे वो सलीक़ा उस को दान कर दो
वो पढ़ सके दिल को मेरे ये अज़ीज़ हुनर तुम उसे भी सीखा दो
इस फ़रेब-ए-दुनिया के अँधेरे में एक रौशनी मोहब्बत की तुम उसे दिखा दो
माना कि मैं लड़का हूँ पर ज़िन्दगी मेरी भी आसान नहीं
कभी देखो ग़ौर से चेहरे को मेरे इस पे पहले-सी वो मुस्कान नहीं
अब तुम ही कोई चमत्कार दिखा दो इस राँझे की मुस्कान लौटा दो
ढूँढ़ कर तुम पता कहीं से मेरी हीर को मेरा हाल बता दो
वो मिल जाए तुम्हें तो अच्छा है न मिले तब भी कोई गिला नहीं
तुम लौट जाना घर को अपने सोचना मैं तुम से कभी मिला नहीं
समझकर इक फ़िज़ूल ख़्वाब तुम इस अनचाह क़िस्से को भुला देना
घोंटकर गला जज़्बात का अपने अरमानों को तुम सुला देना
बड़ी मुश्किल से सॅंभाला है ख़ुद को मुझे दोबारा तोड़ने न आना
कहीं और दिल लगा लेना तुम मुझ से रिश्ता जोड़ने न आना
जिस मिलन की तुम को हसरत है वो मिलन कदाचित सम्भव नहीं
दिल लगाने को बेचैन हो तुम तुम्हें दिल टूटने का अनुभव नहीं
ये दोबारा दिल लगाने का हुनर मुझे रास नहीं आता
टूटे दिल को मोहब्बत का अब कोई एहसास नहीं भाता
कैसे हाँ कह दूँ मैं तुम को जब दिल में मेरे कोई आहट नहीं
बस तुम्हारी ख़ुशी को ख़ुदा मान लूँ क्या मेरी अपनी कोई चाहत नहीं
मोहब्बत से मैं समझौता कर लूँ नहीं मुझ को ये मंज़ूर कभी
बस दिल बहलाने को दिल लगा लूँ नहीं इतना मैं मजबूर अभी
माना कि हूँ थोड़ा टूटा मगर किसी हमदर्दी की चाहत नहीं
तुम्हारा होना भी एक डर है इस मौजूदगी से मुझे कोई राहत नहीं
बस भी करो यूँ याद करना मुझे ये मुसलसल हिचकियाँ अब सही नहीं जातीं
बे-दर्द ये बे-रुख़ी बातें बार-बार मुझ से अब कही नहीं जातीं
न जाने क्यूँ मेरी ख़ातिर तुम अपनों से फ़साद करती हो
मुझ काफ़िर के इश्क़ में ख़ुद को क्यूँ नाशाद करती हो
ऐ अजनबी क्यूँ बार-बार तुम मुझे याद करती हो
अपना कीमती वक़्त क्यूँ मुझ पर यूँ बर्बाद करती हो
ऐ अजनबी क्यूँ बार-बार तुम मुझे याद करती हो















