Rehaan
Rehaan
Nazm

'तुम पूछते हो कि वो क्या है'

तुम पूछते हो कि वो क्या है
क्यूँ उस पर दिल मेरा यूँ फ़िदा है
मैं करता हूँ बस बातें उसी की
जाने मुझे ये हो क्या गया है
मेरी ग़ज़ल-शायरी में बस नाम उसी का
वो राधा और मैं बस श्याम उसी का
लगे है जग झूठा बस वो ही एक सच्ची
सूरत कि जैसे कोई मासूम-सी बच्ची
वो हँसे तो होंठों से फूल झरे
निगाहें बस उसी को ढूँढा करें
वो देखे तो लगतें हसीं लम्हात हैं
सँवारे जब ज़ुल्फ़ें तो क्या बात है
वो जान है मेरी वो मेरी महरम है
ता'रीफ़ें जितनी भी करूँ उस की कम हैं

वो सितारों का आसमाँ वो बहारों का गुलिस्ताँ
वो पूनम की चाँदनी कोई दिलकश-सी रागिनी
वो जाड़े की धूप वो अप्सरा का स्वरूप
वो ग़ालिब की ग़ज़ल वो राधा-सी सरल
वो सरस्वती की वीणा और मीरा का एकतारा
वो गंगा-सी पावन और यमुना की धारा
वो परियों की रानी वो संगम का पानी
वो तुलसी-सी पवित्र उस का सीता-सा चरित्र
वो मुरली की तान वो वेदों का ज्ञान
वो फूलों-सी कोमल है चंदन-सी शीतल
वो मथुरा की सुब्ह और अवध की शाम
वो बनारस की गलियाँ और वो ही चारों धाम
है ख़ूब-सूरत वो उस
में हया भी है
वो दवा भी है वो दुआ भी है

हैं रातें उसी से उसी से सवेरा
वो रूठे तो छा जाए जग में अँधेरा
वो बोले तो फ़िज़ाएँ बहना छोड़ दें
शाइ'र भी शा'इरी कहना छोड़ दें
वो चाहे तो चाँद को ज़मीं पे बुला दे
घटाओं से कहीं भी बारिश करा दे
वो मुस्कुराए तो मौसम ख़ुश-नुमा हो जाए
हर मुसाफ़िर उस का रहनुमा हो जाए
वो जैसे कि फ़रवरी का महीना है
है काशी वो वो ही मदीना है
वो छठ भी है वो रमज़ान भी है
वो गीता भी है वो क़ुरान भी है
वो लड़की नहीं वो मेरी ख़ुदा है
और तुम पूछते हो कि वो क्या है

— Rehaan

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