Rehaan
Rehaan
Ghazal

एक लड़के की फ़क़त ये दास्ताँ

इश्क़ उस ने था किया बे-इन्तिहाँ

याद है उस को सनम की हर अदा
शोख़ियाँ-ओ-सुर्ख़ियाँ-ओ-बोसियाँ

छोड़कर उस को चली फिर वो गई
ख़ुश-ज़बाँ था बन गया अब बे-ज़बाँ

फिर वही दिल टूटने का ग़म लिए
बह रहीं तन्हाइयों की आँधियाँ

राह में बैठे हो किस के वास्ते
पूछती हैं रात-दिन अब खिड़कियाँ

फिर उठाने को क़लम मजबूर वो
चल पड़ा है जानिब-ए-इत्लाफ़ियाँ

मौत की दहलीज़ पर होकर खड़ा
कर रहा वो ज़िन्दगी से अर्ज़ियाँ

एक घर 'रेहान' है मातम-नशीं
एक घर में बज रहीं शहनाइयाँ

— Rehaan

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