एक लड़के की फ़क़त ये दास्ताँ
इश्क़ उस ने था किया बे-इन्तिहाँ
याद है उस को सनम की हर अदा
शोख़ियाँ-ओ-सुर्ख़ियाँ-ओ-बोसियाँ
छोड़कर उस को चली फिर वो गई
ख़ुश-ज़बाँ था बन गया अब बे-ज़बाँ
फिर वही दिल टूटने का ग़म लिए
बह रहीं तन्हाइयों की आँधियाँ
राह में बैठे हो किस के वास्ते
पूछती हैं रात-दिन अब खिड़कियाँ
फिर उठाने को क़लम मजबूर वो
चल पड़ा है जानिब-ए-इत्लाफ़ियाँ
मौत की दहलीज़ पर होकर खड़ा
कर रहा वो ज़िन्दगी से अर्ज़ियाँ
एक घर 'रेहान' है मातम-नशीं
एक घर में बज रहीं शहनाइयाँ
— Rehaan















