Rehaan
Rehaan
Ghazal

तुम्हारा ग़म भुला कर के ये दिल आबाद करना था

कि ख़ुद को इश्क़ की ज़ंजीर से आज़ाद करना था

बिखर जाने से अच्छा था कि फिर से दिल लगा लेते
फ़क़त रस्म-ए-वफ़ा को छोड़ ख़ुद को शाद करना था

न सोचा था तड़पना भी पड़ेगा इश्क़ में इक दिन
ख़ुदा से वस्ल की ख़ातिर न यूँ फ़रियाद करना था

किया था इत्तिला सब ने हमें तुम छोड़ जाओगी
ये दिल पागल इसे ख़ुद को मगर फ़रहाद करना था

तुम्हें मालूम था हम टूट जाएँगे तुम्हारे बा'द
तुम्हें तो पर शुरू से ही हमें बर्बाद करना था

हमें अब काम में कुछ इस क़दर मसरूफ़ होना है
कि अब ये भी न याद आए कि तुम को याद करना था

सुनाया था सभी को दुख पिरो कर शे'र में हम ने
मगर परवाह क्या उन को तो बस इरशाद करना था

सुनो 'रेहान' मत कहना कि था वो कौन सा इक शहर
दु'आओं में तुम्हें जिस को इलाहाबाद करना था

— Rehaan

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