Rehaan
Rehaan
Ghazal

तेरे आने का ग़म तेरे जाने का ग़म

और दिल भी तुझी से लगाने का ग़म

कल तलक झेलते आएँ तेरे सितम
अब है बे-दर्द काफ़िर ज़माने का ग़म

दोस्तों को ख़ुशी जन्मदिन की मेरे
है मगर मुझ को बचपन गँवाने का ग़म

शम्अ' जल ही न पाई सहर तक कभी
है फ़क़त बस यही हर दिवाने का ग़म

कल बनाई तेरी पेंटिंग शौक़ से
आज है पेंटिंग भी बनाने का ग़म

है तुझे ग़म कि ज़िन्दा हूँ मैं अब तलक
मैं कि मुझ को तेरा दिल दुखाने का ग़म

आज तो रो रहा हूँ मैं ग़म में तेरे
कल मुझे होगा फिर ग़म भुलाने का ग़म

बा'द इतने ग़मों के भी 'रेहान' फिर
है हर इक रात ख़ुद को मनाने का ग़म

— Rehaan

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