Rehaan
Rehaan
Ghazal

राम सी सीरत कहाँ अब कृष्ण सी उल्फ़त कहाँ

सब फ़रेबी हैं किसी में अब कोई ग़ैरत कहाँ

प्रेमिका बेटी बहन बेशक सभी अच्छी हैं पर
माँ के जैसी इस जहाँ में कोई भी औरत कहाँ

डेढ़ दिन की ज़िन्दगी ने बस यही सिखलाया है
जुस्तुजू में जो मज़ा मंज़िल में वो इशरत कहाँ

साथ तेरे अब हर इक लम्हा गुज़रता है मेरा
तुझ से मिलने के लिए अब नींद से मिन्नत कहाँ

सब बुलाते हैं मुझे बे-वजह दीवाना तेरा
मेरी शोहरत भी सनम अब है मेरी शोहरत कहाँ

जो शिकस्त-ए-दिल से डर जाते हैं उन को क्या ख़बर
इज़्तिराब-ए-इश्क़ से बेहतर कोई लज़्ज़त कहाँ

हर दुआ में कल तलक माँगी थी बस ख़ुशियाँ तेरी
आज अचानक बद-दुआ दूँ मेरी ये फ़ितरत कहाँ

भूल से भी वस्ल की ग़ज़लें लिखी मैं ने अगर
लोग समझेंगे कि अब 'रेहान' को ज़हमत कहाँ

— Rehaan

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