Jagat Singh

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    क़ीमतें बहुत बढ़ी दुकानों पे गुलाब की
    जब पता चला उसे गुलाब अच्छे लगते हैं
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    तो आज से सब शेर चिड़िया घर गए
    जंगल पे अब बस गीदड़ों का राज है
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    तुमने मुझे जब से किया है ख़ुद क़रीब
    सबकी ज़बाँ पे तब से मेरा नाम है
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    हाँ 'इज़्ज़त-आबरू की तेरे शामत आने वाली है
    किए पर दीन की तेरे बग़ावत आने वाली है
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    क्यूँकर दिवाली है सजी वो तो अभी आए नहीं
    उनके बिना ये घर सजे तो फिर सजें कैसे बता
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    मैं इस ही बात से दिल बहला लेता हूँ
    चलो झूठा सही है प्यार तो उनको
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    मत करो दुबारा तुम वापस आने का वादा
    रब को मुँह दिखाना है कितना अब कहोगे झूठ
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    चाहिए पल क़यामत के आने को बस
    कौनसे कल की तुम बात करते हो फिर
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    कहदो ग़म अपना दिल हल्का हो
    पर ये कहना ही आसाँ नहीं
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    'जगत' तब इक परिंदा क़ैद मैंने कर लिया था जब
    कहा तूने कि अब से दोस्त बनकर ही रहेंगे हम
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