भले कितना हमें दफ़्तर पुकारे क्या ही आएँगे
मुहब्बत रिज़्क़ हो जिन का कमाने क्या ही आएँगे
मुहब्बत रिज़्क़ हो जिन का कमाने क्या ही आएँगे
मैं अंधा हो गया हूँ अब ज़रा सी बद-गुमानी में
कि आँखें फोड़ने के बा'द सपने क्या ही आएँगे
अगरचे हुस्न के दम पर तरक़्क़ी मिलनी है तो फिर
बुलंदी पर हुनर लबरेज़ लडक़े क्या ही आएँगे
मिरा बचपन भी गुज़रा है मुहल्ले के फ़सादों में
मिरी जानिब को खिड़की से इशारे क्या ही आएँगे
क़बीले में मुहब्बत की सज़ा में पाँव कटते हैं
हमारे हिस्से में अब सात फेरे क्या ही आएँगे
तिरी ज़ंजीर की खन खन ने बहरा कर दिया मुझ को
तिरी पाज़ेब की छन छन को सुनके क्या ही आएँगे
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सब दिए बुझ गए और इन आँखों में
अश्क़-ओ-ख़ूँ तो भरा है प घी ही नहीं
अश्क़-ओ-ख़ूँ तो भरा है प घी ही नहीं
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गर हार जाऊँ तो हुनर कम है मुझे
और जीत को क़िस्मत बताया जाएगा
और जीत को क़िस्मत बताया जाएगा
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कहता, चला जाता है क्या क्या इश्क़ में
क्या क्या का मतलब क्या है? क्या क्या जाएगा?
क्या क्या का मतलब क्या है? क्या क्या जाएगा?
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शतरंज है इश्क़-ओ-अना के दरमियाँ
रानी बचाऊँगा तो राजा जाएगा
रानी बचाऊँगा तो राजा जाएगा
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मैं तेरे शहर में जलते दिए लाया नहीं होता
जो याद आता कि तारीकी का वाँ पहरा नहीं होता
जो याद आता कि तारीकी का वाँ पहरा नहीं होता
सलीक़े से छुपाती है वो औरत ज़ख़्म चेहरे के
सभी घूँघट का मक़्सद ग़ैर से पर्दा नहीं होता
जिसे मन्नत में माँगा था वही बेटा रुलाता है
सभी माँ के लिए फल सब्र का मीठा नहीं होता
नहीं होता भरोसा मुझ को लँगड़े इश्क़ पर जिस
में
दिवाना वस्ल होता है मगर ग़ुस्सा नहीं होता
यही सब लोग चाहेंगे तुम्हारा काम रुक जाए
कहेंगे होने पर "मेहनत से आख़िर क्या नहीं होता
मैं इतना बोल पाया था "सुनो बच्चों ख़ुदा सबका..."
यतीमों से उठा हल्ला "नहीं होता नहीं होता"
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मत पूछिए "भला क्यूँ रिश्ते सँभालते हैं?"
सहरा में आँसू तक को प्यासे सँभालते हैं
सहरा में आँसू तक को प्यासे सँभालते हैं
साहब कि ये हवेली है दश्त की ज़मीं पर
साहब हवेली में क्यूँ पौधे सँभालते हैं
हम ने सँभाला अपने अंदर उसे है मानो
मुफ़लिस फटे फिरन में पैसे सँभालते हैं
कंधे शरीफ घर के ये जानते हैं बेहतर
हो भीड़ तो दुपट्टा कैसे सँभालते हैं
बनवा के काँच के घर इतना तो याद रखना
उन घर की इज़्ज़तें फिर पर्दे सँभालते हैं
इक्कीसवीं सदी के आशिक़ बहुत हैं शातिर
करियर सँभाल कर फिर वादे सँभालते हैं
था बाप से जुदा और भूला 'अखिल' कि आगे
ये दास्तान ख़ुद के बच्चे सँभालते हैं
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एक मैं भी रहूँ इक जहाँ भी रहे
शंख गूँजे सदा और अज़ाँ भी रहे
शंख गूँजे सदा और अज़ाँ भी रहे
इक दुआ में ही माँगी है दो और दुआ
बाप राशन ख़रीदे तो माँ भी रहे
क़ब्र में क़हक़हे हैं उसी की सनद
बोली थी "ख़ुश रहे तू जहाँ भी रहे
दिल भी जलकर बने हुस्न-ए-रंज-ओ-करम
रौशनी भी रहे और धुआँ भी रहे
पानी पी कर ही डूबेंगे मग़रूर सब
सो नदी के किनारे कुआँ भी रहे
सर पटक के अगर मुस्कुराऊँ भी मैं
चाहता हूँ जबीं पर निशाँ भी रहे
सिर्फ़ भँवरे नहीं हैं रुकावट यहाँ
फूल तोड़ो तो काँटो का ध्याँ भी रहे
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आए थे ग़मगुसार भी मुस्कान बाँटने
ग़म माँगने लगे मेरा ग़म-ख़्वार देख कर
ग़म माँगने लगे मेरा ग़म-ख़्वार देख कर
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