Akhil Saxena

Akhil Saxena

@akki.saxena03

Akhil Saxena shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Akhil Saxena's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

सब दिए बुझ गए और इन आँखों में अश्क़-ओ-ख़ूँ तो भरा है प घी ही नहीं — Akhil Saxena
भाई ने मारा भाई को ये सोच कर ज़िंदा रहा तो आधा हिस्सा जाएगा — Akhil Saxena
कहता, चला जाता है क्या क्या इश्क़ में क्या क्या का मतलब क्या है? क्या क्या जाएगा? — Akhil Saxena
शतरंज है इश्क़-ओ-अना के दरमियाँ रानी बचाऊँगा तो राजा जाएगा — Akhil Saxena
जिसे जो शय पसंद आई उसी पर बैठ गया मैं तो तंग आदमी था ज़हर खा कर बैठ गया — Akhil Saxena
जो क़ैस का था कहीं मेरा भी वो हाल न हो इलाज-ए-हिज्र से बेहतर तो है विसाल न हो — Akhil Saxena
सच बताऊँ तो हम दोनों में फ़ासला एक झूठी ख़बर से बनाया गया — Akhil Saxena
क़ब्र में क़हक़हे हैं उसी की सनद बोली थी "ख़ुश रहे तू जहाँ भी रहे" — Akhil Saxena
तेरा नाम सुनके कहा मैं ने क़ातिल सभी चीख़ उट्ठे हमारा हमारा — Akhil Saxena
गर हार जाऊँ तो हुनर कम है मुझे और जीत को क़िस्मत बताया जाएगा — Akhil Saxena
जब ख़त्म हो जाएगी ख़ुशबू फूल की तब इस के काँटों को गिनाया जाएगा — Akhil Saxena
जो शख़्स कहता है कि देखा जाएगा वो देखने से पहले मारा जाएगा — Akhil Saxena
कहानी में मिरा किरदार फीका पड़ गया था सो अगले यार की सूरत परी जमाल न हो — Akhil Saxena
कोई गुरेज़ नहीं उस को मेरी ख़ुद-कुशी से है शर्त आख़िरी में उस का फ़ोन काल न हो — Akhil Saxena
आए थे ग़मगुसार भी मुस्कान बाँटने ग़म माँगने लगे मेरा ग़म-ख़्वार देख कर — Akhil Saxena

Ghazal

हर इक लड़की को रस्मों से डराकर मार देते थे जो करवाचौथ की ही शाम शौहर मार देते थे न जाने इश्क़ का बिच्छू यूँँ कैसे डस गया नस्लें हम ऐसे लोग थे जो रोज़ अजगर मार देते थे वो इक लडक़ी जो छत पे रहती थी इक ख़त की ख़्वाहिश में वो कुछ लड़के मुहल्ले के कबूतर मार देते थे वो जिस दरिया किनारे बैठे हम तुम उस ही दरिया में दिखे जो हंस का जोड़ा तो पत्थर मार देते थे ख़ुद अपना ध्यान रखने की सलाहें बाँटने के बा'द घर आके यक-ब-यक दीवार में सर मार देते थे तुम्हारे साथ था वो शख़्स सो हम हो गए मद्धम वगरना ऐसे लड़कों को तो टक्कर मार देते थे किसी रोटी ने रो कर बद-दुआ में दे दिए काँसे यही सब शाह दस्तर-ख़्वाँ को ठोकर मार देते थे फ़साद-ए-दीन में मारा हुआ बच्चा ख़ुदाओं को बताएगा तुम्हारा नाम ले कर मार देते थे — Akhil Saxena
मत पूछिए "भला क्यूँ रिश्ते सँभालते हैं?" सहरा में आँसू तक को प्यासे सँभालते हैं साहब कि ये हवेली है दश्त की ज़मीं पर साहब हवेली में क्यूँ पौधे सँभालते हैं हम ने सँभाला अपने अंदर उसे है मानो मुफ़लिस फटे फिरन में पैसे सँभालते हैं कंधे शरीफ घर के ये जानते हैं बेहतर हो भीड़ तो दुपट्टा कैसे सँभालते हैं बनवा के काँच के घर इतना तो याद रखना उन घर की इज़्ज़तें फिर पर्दे सँभालते हैं इक्कीसवीं सदी के आशिक़ बहुत हैं शातिर करियर सँभाल कर फिर वादे सँभालते हैं था बाप से जुदा और भूला 'अखिल' कि आगे ये दास्तान ख़ुद के बच्चे सँभालते हैं — Akhil Saxena
भले कितना हमें दफ़्तर पुकारे क्या ही आएँगे मुहब्बत रिज़्क़ हो जिन का कमाने क्या ही आएँगे मैं अंधा हो गया हूँ अब ज़रा सी बद-गुमानी में कि आँखें फोड़ने के बा'द सपने क्या ही आएँगे अगरचे हुस्न के दम पर तरक़्क़ी मिलनी है तो फिर बुलंदी पर हुनर लबरेज़ लडक़े क्या ही आएँगे मिरा बचपन भी गुज़रा है मुहल्ले के फ़सादों में मिरी जानिब को खिड़की से इशारे क्या ही आएँगे क़बीले में मुहब्बत की सज़ा में पाँव कटते हैं हमारे हिस्से में अब सात फेरे क्या ही आएँगे तिरी ज़ंजीर की खन खन ने बहरा कर दिया मुझ को तिरी पाज़ेब की छन छन को सुनके क्या ही आएँगे — Akhil Saxena
मैं तेरे शहर में जलते दिए लाया नहीं होता जो याद आता कि तारीकी का वाँ पहरा नहीं होता सलीक़े से छुपाती है वो औरत ज़ख़्म चेहरे के सभी घूँघट का मक़्सद ग़ैर से पर्दा नहीं होता जिसे मन्नत में माँगा था वही बेटा रुलाता है सभी माँ के लिए फल सब्र का मीठा नहीं होता नहीं होता भरोसा मुझ को लँगड़े इश्क़ पर जिस में दिवाना वस्ल होता है मगर ग़ुस्सा नहीं होता यही सब लोग चाहेंगे तुम्हारा काम रुक जाए कहेंगे होने पर "मेहनत से आख़िर क्या नहीं होता मैं इतना बोल पाया था "सुनो बच्चों ख़ुदा सबका..." यतीमों से उठा हल्ला "नहीं होता नहीं होता" — Akhil Saxena
एक क़ातिल हुनर से बनाया गया जब कुल्हाड़ा शजर से बनाया गया फँस गया आँख के एक हिस्से में मैं जो यक़ीनन भँवर से बनाया गया अब हकीमों के बस का नहीं ज़ख़्म जो उस के तीर-ए-नज़र से बनाया गया जब अमीरी उड़ी तो लगा पैसे को बाज़ के जिस्म-ओ-पर से बनाया गया बेटी की रुख़्सती का ये दस्तूर बस नारी शक्ति के डर से बनाया गया सच बताऊँ तो हम दोनों में फ़ासला एक झूठी ख़बर से बनाया गया दर्द दिल का मेरे सर पे चढ़ता नहीं उस का दिल दर्द-ए-सर से बनाया गया जब निचोड़ा धनक को तो जाना यही उस के लब के कलर से बनाया गया उस की शादी में खाया तो कड़वा लगा शाही टुकड़ा शकर से बनाया गया — Akhil Saxena