Dinesh Kumar

Dinesh Kumar

@dinesh-kumar

Dinesh Kumar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Dinesh Kumar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
हुनर नहीं जो हवाओं के पर कतरने का
रहेगा ख़ौफ़ हमेशा ही बुझ के मरने का

हम आइनों के मुख़ातब न हो सकेंगे कभी
हमें तो ख़तरा है अपना नक़ाब उतरने का

वफ़ा की राह पे मरना भी था मुझे मंज़ूर
कोई तो होगा सबब मेरे अब मुकरने का

दराड़ बढ़ती है बढ़ जाए बद-गुमानी की
इरादा मेरा भी उन से न बात करने का

बहेलिए की कहानी से ही डरे ताइर
रहा न हौसला उन में उड़ान भरने का

न उस ने दिल से मुझे रोकने की कोशिश की
न मेरे पास समय था वहाँ ठहरने का

सफ़ेद होने लगीं हैं हमारी भी क़लमें
निशान पड़ने लगा वक़्त के गुज़रने का

फ़लक से राह-नुमाई 'दिनेश' ने की थी
सवाल उठता कहाँ ज़ुल्मतों से डरने का
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वो क़लंदरों में शुमार है
ग़म-ए-ज़ीस्त से उसे प्यार है

मिरे बाग़-ए-दिल के नसीब में
फ़क़त इंतिज़ार-ए-बहार है

ग़म-ए-आशिक़ी से जो पूछिए
ये जहाँ भी उजड़ा दयार है

जिसे ताज कहता है ये जहाँ
वो हक़ीक़तन तो मज़ार है

ये अजब नहीं कि जुनून-ए-इश्क़
सर-ए-दार था सर-ए-दार है

मैं जो हक़-हलाल की रह पे हूँ
मुझे ख़्वाब में भी क़रार है

मिरी धड़कनें भी हैं बहर में
मुझे शाइ'री का ख़ुमार है
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Dinesh Kumar
किताब-ए-ज़ीस्त से कुछ इक़्तिबास तस्वीरें
ख़ुशी के लम्हों में देतीं मिठास तस्वीरें

अकेले-पन भी हमारा ये दूर करती है
कि रख के देखो ज़रा अपने पास तस्वीरें

कुछ ऐसे रंग भरो जो समय से उतरे नहीं
ये मू-क़लम से करें इल्तिमास तस्वीरें

ख़ुदा के पास गए जब से वालदैन मिरे
मिरी हयात की है बस असास तस्वीरें

सुलगती रेत प सागर का अक्स भी दिखता
लगाती देखिए क्या क्या क़यास तस्वीरें

गुज़िश्ता वक़्त में रहना 'दिनेश' छोड़ भी दे
न बार बार तू अब देख उदास तस्वीरें
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सब के चेहरों पे जब ख़ुशी होगी
क्या 'दिनेश' ऐसी सुब्ह भी होगी

लोग निकले हैं जो ये शम्अ लिए
निर्भया फिर कोई लुटी होगी

सर्द मौसम में बे-घरों की दशा
बेबसी ख़ुद भी रो रही होगी

क्या कभी इंक़लाब आएगा
इन अँधेरों में रौशनी होगी

सब के होंटों पे ये सवाल है अब
कब सियासत को हथकड़ी होगी

अब्र बरसेगा टूट कर जिस दिन
दूर धरती की तिश्नगी होगी

उठ के ज़ालिम को दे जवाब 'दिनेश'
ज़ुल्म सहना तो बुज़दिली होगी
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रोज़ के इंतिज़ाम से पहले
मैं ने कल पी ली शाम से पहले

घूँट भरने पे होश आया था
मैं नशे में था जाम से पहले

क्या करूँ अब ज़बान से मेरी
रम निकलता है राम से पहले

दिल मिरा अब शराब माँगे है
काम के बाद काम से पहले

कुछ पिलाने का बंदोबस्त करो
तुम मिरे एहतिराम से पहले

चश्म-ए-हसरत को पढ़ के देखो तुम
क्या ये माँगे सलाम से पहले

ज़िंदगी को तलाशता हूँ मैं
मौत के एहतिमाम से पहले
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नक़ाब चेहरे पे बातें लुआब-दार करे
वो रहनुमा है सियासत का कारोबार करे

ये सिर्फ़ ख़्वाबों किताबों की बात लगती है
कि इक ग़रीब की इमदाद माल-दार करे

नए ज़माने का रहज़न नया सलीक़ा है
वो लौटता है मगर पहले होशियार करे

चराग़ ले के भी ढूँढेंगे तो मिलेगी नहीं
जहाँ में एक भी हस्ती जो माँ सा प्यार करे

हवा के ज़ोर से ही कश्तियाँ नहीं चलतीं
कि नाख़ुदा भी ख़ुदा से ज़रा गुहार करे

वो गुल-बदन है मुकम्मल बहार से बढ़ कर
बस उस का ज़िक्र ही मौसम को ख़ुश-गवार करे

न जाने कौन सी बस्ती का तू है बाशिंदा
तुझे 'दिनेश' कोई ग़म न बे-क़रार करे
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Dinesh Kumar
हर काम यूँ करो कि हुनर बोलने लगे
मेहनत दिखे सभी को असर बोलने लगे

इस बेवफ़ा से बोलना तौहीन थी मिरी
लेकिन ये मेरे ज़ख़्म-ए-जिगर बोलने लगे

तहज़ीब चुप है इल्म-ओ-अदब आज शर्मसार
देखो पिता के मुँह पे पिसर बोलने लगे

आँखों से मैं ज़बान का ऐसे भी काम लूँ
जो भी मैं कहना चाहूँ नज़र बोलने लगे

सब हम को बुत-परस्त समझते रहे मगर
ऐसे तराशे हम ने हजर बोलने लगे

दैर-ओ-हरम के नाम पे जब शहर बट गया
दोनों तरफ़ से तेग़-ओ-तबर बोलने लगे

मैं ने ग़ज़ल सुनाई 'ज़फ़र' की ज़मीन में
सब दोस्त मेरे मुझ को ज़फ़र बोलने लगे

तू है 'दिनेश' और वो है चौदहवीं का चाँद
आपस में कब से शम्स-ओ-क़मर बोलने लगे
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Dinesh Kumar
तिरा वजूद तिरी शख़्सियत कहानी क्या
किसी के काम न आए तो ज़िंदगानी क्या

हवस है जिस्म की आँखों से प्यार ग़ाएब है
बदल गए हैं सभी इश्क़ के मआ'नी क्या

अज़ल से जारी है ता हश्र ही चलेगा सफ़र
समय के सामने दरियाओं की रवानी क्या

ये मानता हूँ मैं मेहमाँ ख़ुदा की रहमत है
के तुम ने देखी नहीं मेरी मेज़बानी क्या

ख़ुमार-ए-इश्क़ भी उतरेगा रोज़-ए-वस्ल के बाद
रहेगी अपनी भला उम्र भर जवानी क्या

बिना लड़े ही जो तू मुश्किलों से हारा है
रगों में तेरी लहू बन गया है पानी क्या

ख़ुशी की चाह में कुछ ग़म उठाने पड़ते हैं
गुलों की ख़ार नहीं करते पासबानी क्या
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Dinesh Kumar
बाद मरने के भी दुनिया में हो चर्चा मेरा
ऐसी शोहरत की बुलंदी हो ठिकाना मेरा

मैं हूँ इक प्रेम पुजारी ऐ मिरी जान-ए-हयात
तू है मंदिर तू कलीसा तू ही का'बा मेरा

मेरे बेटे की निगाहों में हैं कुछ ख़्वाब मिरे
ज़िंदगी उस की है जीने का सहारा मेरा

मौत भी चैन से आती है कहाँ इंसाँ को
ज़ेहन में गूँजता ही रहता है मेरा मेरा

अब भी रातों को मिरी नींद उचट जाती है
आह इक चाँद को छूने का वो सपना मेरा

अन-कही बात मिरी क्या वो समझ पाएँगे
क्या मुकम्मल कभी हो पाएगा क़िस्सा मेरा

सिलवटें वक़्त की पड़ने ही लगीं उस पे 'दिनेश'
तुम ने देखा ही कहाँ ग़ौर से चेहरा मेरा
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Dinesh Kumar
तीर-ए-अबरू जब कमाँ तक आ गए
उन की ज़द में जिस्म-ओ-जाँ तक आ गए

दाग़ सीरत पर लगे थे और हम
बस्ती-ए-सूरत-गराँ तक आ गए

रफ़्ता रफ़्ता कम हुआ ज़ब्त-ए-अलम
दर्द-ए-जाँ मेरी ज़बाँ तक आ गए

हम को भी इक गुल-बदन की चाह थी
हम भी कोई गुल्सिताँ तक आ गए

मंज़िल-ए-मक़्सूद भी दिखने लगी
हम जो मीर-ए-कारवाँ तक आ गए

याद आया जब हमें बचपन बहुत
हम खिलौनों की दुकाँ तक आ गए

क़ातिलों के पास थी दौलत अपार
उन के हक़ में हुक्मराँ तक आ गए

मौसम-ए-गुल सिर्फ़ यादों में है अब
उम्र गुज़री हम ख़िज़ाँ तक आ गए
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Dinesh Kumar
अपनी मंज़िल की जो हसरत करना
घर से चलने की भी हिम्मत करना

कोई तुझ को जो अमानत सौंपे
जान दे कर भी हिफ़ाज़त करना

कहना आसान है करना मुश्किल
दुश्मनों से भी मोहब्बत करना

आज बचपन में है वो बात कहाँ
वक़्त बे-वक़्त शरारत करना

तेरे भीतर का ख़ुदा जाग उठे
इतनी शिद्दत से इबादत करना

जब उसे दोस्त कहा है तुम ने
उस के दुख दर्द में शिरकत करना

फ़र्ज़ औलाद का होता है 'दिनेश'
अपने माँ बाप की ख़िदमत करना
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Dinesh Kumar
ख़बर कहाँ थी मुझे पहले इस ख़ज़ाने की
ग़मों ने राह दिखाई शराब-ख़ाने की

चराग़-ए-दिल ने की हसरत जो मुस्कुराने की
तो खिलखिला के हँसीं आँधियाँ ज़माने की

मैं शाइ'री का हुनर जानता नहीं बे-शक
अजीब धुन है मुझे क़ाफ़िया मिलाने की

वजूद अपना मिटाया किसी की चाहत में
बस इतनी राम-कहानी है इस दीवाने की

वो घोंसला भी बना लेगा बा'द में अपना
अभी है फ़िक्र परिंदे को आब-ओ-दाने की

मैं अश्क बन के गिरा हूँ ख़ुद अपनी नज़रों से
कहाँ मिलेगी जगह मुझ को सर छुपाने की

अनाथ बच्चों की आहें सवाल करती हैं
ख़ुदा को क्या थी ज़रूरत जहाँ बनाने की
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Dinesh Kumar
ख़ुद को न ऐ बशर कभी क़िस्मत पे छोड़ तू
दरिया की तेज धार को हिम्मत से मोड़ तू

इस ज़िंदगी की राह में दुश्वारियाँ भी हैं
रहबर का हाथ छोड़ न रिश्तों को तोड़ तू

दुनिया की हर बुलंदी को है तेरा इंतिज़ार
एहसास-ए-ना-रसाई की गर्दन मरोड़ तू

मेहनत के दम पे क्या नहीं कर सकता आदमी
अपने लहू का आख़िरी क़तरा निचोड़ तू

जो कुछ है तेरे पास वही काम आएगा
बारिश की आस में कभी मटकी न फोड़ तू

मन की ख़ुशी मिलेगी तू ये नेक काम कर
टूटे हुए दिलों को किसी तरह जड़े तू

दो-गज़ कफ़न ही अंत में सब का नसीब है
अब छोड़ भी 'दिनेश' ये दौलत की होड़ तू
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अपने ख़्वाबों के मय-कदे में हूँ
रिंद हूँ मैं ज़रा नशे में हूँ

मौत ही मेरी आख़िरी मंज़िल
मैं जनम से ही क़ाफ़िले में हूँ

जब उड़ूँगा फ़लक भी चूमूँगा
मैं अभी तक तो घोंसले में हूँ

ज़िंदगी-भर रहेगा साथ उन का
ख़ूबसूरत मुग़ालते में हूँ

मुस्कुराता हूँ अब ग़मों में भी
दोस्तो मैं बहुत मज़े में हूँ

हक़-परस्ती है मेरा नाम 'दिनेश'
आज-कल सिर्फ़ आइने में हूँ
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Dinesh Kumar
मैं अपने काम अगर वक़्त पर नहीं करता
तो कामयाबी का पर्वत भी सर नहीं करता

हसीन ख़्वाब अगर दिल में घर नहीं करता
तवील रात से मैं दर-गुज़र नहीं करता

सिखा दिया है मुझे ग़म ने ज़िंदगी का हुनर
किसी भी हाल में अब आँख तर नहीं करता

गिरे ज़मीन पे दस्तार सर के झुकने से
मैं हुक्मराँ को सलाम इस क़दर नहीं करता

मैं अपने अज़्म की पतवार साथ रखता हूँ
मिरे सफ़ीने पे तूफ़ाँ असर नहीं करता

ग़ुरूर साथ में चलता है हर घड़ी उस के
वो अब अमीर है तन्हा सफ़र नहीं करता

दिया उमीद का तू हर घड़ी जलाए रख
हर एक रात की क्या रब सहर नहीं करता

अजब जवाब था उन का 'दिनेश' सोचेंगे
सुना था इश्क़ कोई सोच कर नहीं करता
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कुछ हक़ीक़त है कुछ कहानी है
सिर्फ़ कहने को हक़-बयानी है

इश्क़-ए-फ़ानी रवाँ हुआ जब जब
हसरतों पर चढ़ी जवानी है

नाव साहिल पे आ के डूब गई
ना-ख़ुदाओं की मेहरबानी है

जो दिए ओट में थे वो ही बुझे
ये हवाओं की पासबानी है

ज़र्द पत्तों ने मुस्कुरा के कहा
फ़स्ल-ए-गुल है हवा सुहानी है

शाम की चाय उन के साथ पियूँ
दिल की हसरत बहुत पुरानी है

रौशनाई बनाई अश्कों से
मेरी ग़ज़लों में अब रवानी है
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Dinesh Kumar
बचपन था वो हमारा या झोंका बहार का
लौट आए काश फिर वो ज़माना बहार का

खिड़की में इक गुलाब महकता था सामने
बरसों से बंद है वो दरीचा बहार का

कलियों का हुस्न गुल की महक तितलियों का रक़्स
है याद मुझ को आज भी चेहरा बहार का

अर्सा गुज़र गया प लगे कल की बात हो
उस बाग़-ए-हुस्न में मिरा दर्जा बहार का

दौर-ए-ख़िज़ाँ में दिल के बहलने का है सबब
आँखों में मेरी क़ैद नज़ारा बहार का

कलियाँ को बाग़बाँ ही मसलता है जब कभी
रोता है ज़ार ज़ार कलेजा बहार का

मर्ज़ी पे गुल्सिताँ की भला कब है मुनहसिर
आना बहार का या न आना बहार का
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नेकियाँ तो आप की सारी भुला दी जाएँगी
ग़लतियाँ राई भी हों पर्वत बना दी जाएँगी

रौशनी दरकार होगी जब भी महलों को ज़रा
शहर की सब झुग्गियाँ पल में जला दी जाएँगी

फिर कोई तस्वीर हाकिम को लगी है आइना
उँगलियाँ तय हैं मुसव्विर की कटा दी जाएँगी

उन के अरमानों की पर्वा अहल-ए-महफ़िल को कहाँ
सुब्ह होते ही सभी शमएँ बुझा दी जाएँगी

नाम पत्थर पर शहीदों के लिखे तो जाएँगे
हाँ मगर क़ुर्बानियाँ उन की भुला दी जाएँगी

कौन मुरझाने से रोकेगा गुलों को ऐ 'दिनेश'
बुलबुलें ही बाग़ से जब सब उड़ा दी जाएँगी
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रफ़्ता रफ़्ता तर्जुमानी दर्द की
शाइ'री है क़द्रदानी दर्द की

ज़ख़्म-ए-दिल का मर्तबा शाहों सा है
और दिल है राजधानी दर्द की

हम से पूछो तुम मज़ा तकलीफ़ का
हम ने की है मेज़बानी दर्द की

मुस्कुराहट बा-सबब होंठों पे है
ख़ुश-नुमा रुख़ है निशानी दर्द की

ज़िंदगी में सब भले ग़मगीन हैं
है अलग सब की कहानी दर्द की

ग़मगुसारों से किनारा कर लिया
दिल ने आख़िर बात मानी दर्द की

मर गए होते 'दिनेश' उस के बग़ैर
जी रहे हैं मेहरबानी दर्द की
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