Dinesh Kumar

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    हर काम यूँ करो कि हुनर बोलने लगे
    मेहनत दिखे सभी को असर बोलने लगे

    इस बेवफ़ा से बोलना तौहीन थी मिरी
    लेकिन ये मेरे ज़ख़्म-ए-जिगर बोलने लगे

    तहज़ीब चुप है इल्म-ओ-अदब आज शर्मसार
    देखो पिता के मुँह पे पिसर बोलने लगे

    आँखों से मैं ज़बान का ऐसे भी काम लूँ
    जो भी मैं कहना चाहूँ नज़र बोलने लगे

    सब हम को बुत-परस्त समझते रहे मगर
    ऐसे तराशे हम ने हजर बोलने लगे

    दैर-ओ-हरम के नाम पे जब शहर बट गया
    दोनों तरफ़ से तेग़-ओ-तबर बोलने लगे

    मैं ने ग़ज़ल सुनाई 'ज़फ़र' की ज़मीन में
    सब दोस्त मेरे मुझ को ज़फ़र बोलने लगे

    तू है 'दिनेश' और वो है चौदहवीं का चाँद
    आपस में कब से शम्स-ओ-क़मर बोलने लगे
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    Dinesh Kumar
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    तिरा वजूद तिरी शख़्सियत कहानी क्या
    किसी के काम न आए तो ज़िंदगानी क्या

    हवस है जिस्म की आँखों से प्यार ग़ाएब है
    बदल गए हैं सभी इश्क़ के मआ'नी क्या

    अज़ल से जारी है ता हश्र ही चलेगा सफ़र
    समय के सामने दरियाओं की रवानी क्या

    ये मानता हूँ मैं मेहमाँ ख़ुदा की रहमत है
    के तुम ने देखी नहीं मेरी मेज़बानी क्या

    ख़ुमार-ए-इश्क़ भी उतरेगा रोज़-ए-वस्ल के बाद
    रहेगी अपनी भला उम्र भर जवानी क्या

    बिना लड़े ही जो तू मुश्किलों से हारा है
    रगों में तेरी लहू बन गया है पानी क्या

    ख़ुशी की चाह में कुछ ग़म उठाने पड़ते हैं
    गुलों की ख़ार नहीं करते पासबानी क्या
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    Dinesh Kumar
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    तीर-ए-अबरू जब कमाँ तक आ गए
    उन की ज़द में जिस्म-ओ-जाँ तक आ गए

    दाग़ सीरत पर लगे थे और हम
    बस्ती-ए-सूरत-गराँ तक आ गए

    रफ़्ता रफ़्ता कम हुआ ज़ब्त-ए-अलम
    दर्द-ए-जाँ मेरी ज़बाँ तक आ गए

    हम को भी इक गुल-बदन की चाह थी
    हम भी कोई गुल्सिताँ तक आ गए

    मंज़िल-ए-मक़्सूद भी दिखने लगी
    हम जो मीर-ए-कारवाँ तक आ गए

    याद आया जब हमें बचपन बहुत
    हम खिलौनों की दुकाँ तक आ गए

    क़ातिलों के पास थी दौलत अपार
    उन के हक़ में हुक्मराँ तक आ गए

    मौसम-ए-गुल सिर्फ़ यादों में है अब
    उम्र गुज़री हम ख़िज़ाँ तक आ गए
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    हुनर नहीं जो हवाओं के पर कतरने का
    रहेगा ख़ौफ़ हमेशा ही बुझ के मरने का

    हम आइनों के मुख़ातब न हो सकेंगे कभी
    हमें तो ख़तरा है अपना नक़ाब उतरने का

    वफ़ा की राह पे मरना भी था मुझे मंज़ूर
    कोई तो होगा सबब मेरे अब मुकरने का

    दराड़ बढ़ती है बढ़ जाए बद-गुमानी की
    इरादा मेरा भी उन से न बात करने का

    बहेलिए की कहानी से ही डरे ताइर
    रहा न हौसला उन में उड़ान भरने का

    न उस ने दिल से मुझे रोकने की कोशिश की
    न मेरे पास समय था वहाँ ठहरने का

    सफ़ेद होने लगीं हैं हमारी भी क़लमें
    निशान पड़ने लगा वक़्त के गुज़रने का

    फ़लक से राह-नुमाई 'दिनेश' ने की थी
    सवाल उठता कहाँ ज़ुल्मतों से डरने का
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    Dinesh Kumar
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    ख़बर कहाँ थी मुझे पहले इस ख़ज़ाने की
    ग़मों ने राह दिखाई शराब-ख़ाने की

    चराग़-ए-दिल ने की हसरत जो मुस्कुराने की
    तो खिलखिला के हँसीं आँधियाँ ज़माने की

    मैं शाइ'री का हुनर जानता नहीं बे-शक
    अजीब धुन है मुझे क़ाफ़िया मिलाने की

    वजूद अपना मिटाया किसी की चाहत में
    बस इतनी राम-कहानी है इस दीवाने की

    वो घोंसला भी बना लेगा बा'द में अपना
    अभी है फ़िक्र परिंदे को आब-ओ-दाने की

    मैं अश्क बन के गिरा हूँ ख़ुद अपनी नज़रों से
    कहाँ मिलेगी जगह मुझ को सर छुपाने की

    अनाथ बच्चों की आहें सवाल करती हैं
    ख़ुदा को क्या थी ज़रूरत जहाँ बनाने की
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    मैं अपने काम अगर वक़्त पर नहीं करता
    तो कामयाबी का पर्वत भी सर नहीं करता

    हसीन ख़्वाब अगर दिल में घर नहीं करता
    तवील रात से मैं दर-गुज़र नहीं करता

    सिखा दिया है मुझे ग़म ने ज़िंदगी का हुनर
    किसी भी हाल में अब आँख तर नहीं करता

    गिरे ज़मीन पे दस्तार सर के झुकने से
    मैं हुक्मराँ को सलाम इस क़दर नहीं करता

    मैं अपने अज़्म की पतवार साथ रखता हूँ
    मिरे सफ़ीने पे तूफ़ाँ असर नहीं करता

    ग़ुरूर साथ में चलता है हर घड़ी उस के
    वो अब अमीर है तन्हा सफ़र नहीं करता

    दिया उमीद का तू हर घड़ी जलाए रख
    हर एक रात की क्या रब सहर नहीं करता

    अजब जवाब था उन का 'दिनेश' सोचेंगे
    सुना था इश्क़ कोई सोच कर नहीं करता
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    Dinesh Kumar
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    बचपन था वो हमारा या झोंका बहार का
    लौट आए काश फिर वो ज़माना बहार का

    खिड़की में इक गुलाब महकता था सामने
    बरसों से बंद है वो दरीचा बहार का

    कलियों का हुस्न गुल की महक तितलियों का रक़्स
    है याद मुझ को आज भी चेहरा बहार का

    अर्सा गुज़र गया प लगे कल की बात हो
    उस बाग़-ए-हुस्न में मिरा दर्जा बहार का

    दौर-ए-ख़िज़ाँ में दिल के बहलने का है सबब
    आँखों में मेरी क़ैद नज़ारा बहार का

    कलियाँ को बाग़बाँ ही मसलता है जब कभी
    रोता है ज़ार ज़ार कलेजा बहार का

    मर्ज़ी पे गुल्सिताँ की भला कब है मुनहसिर
    आना बहार का या न आना बहार का
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    नेकियाँ तो आप की सारी भुला दी जाएँगी
    ग़लतियाँ राई भी हों पर्वत बना दी जाएँगी

    रौशनी दरकार होगी जब भी महलों को ज़रा
    शहर की सब झुग्गियाँ पल में जला दी जाएँगी

    फिर कोई तस्वीर हाकिम को लगी है आइना
    उँगलियाँ तय हैं मुसव्विर की कटा दी जाएँगी

    उन के अरमानों की पर्वा अहल-ए-महफ़िल को कहाँ
    सुब्ह होते ही सभी शमएँ बुझा दी जाएँगी

    नाम पत्थर पर शहीदों के लिखे तो जाएँगे
    हाँ मगर क़ुर्बानियाँ उन की भुला दी जाएँगी

    कौन मुरझाने से रोकेगा गुलों को ऐ 'दिनेश'
    बुलबुलें ही बाग़ से जब सब उड़ा दी जाएँगी
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    Dinesh Kumar
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    रफ़्ता रफ़्ता तर्जुमानी दर्द की
    शाइ'री है क़द्रदानी दर्द की

    ज़ख़्म-ए-दिल का मर्तबा शाहों सा है
    और दिल है राजधानी दर्द की

    हम से पूछो तुम मज़ा तकलीफ़ का
    हम ने की है मेज़बानी दर्द की

    मुस्कुराहट बा-सबब होंठों पे है
    ख़ुश-नुमा रुख़ है निशानी दर्द की

    ज़िंदगी में सब भले ग़मगीन हैं
    है अलग सब की कहानी दर्द की

    ग़मगुसारों से किनारा कर लिया
    दिल ने आख़िर बात मानी दर्द की

    मर गए होते 'दिनेश' उस के बग़ैर
    जी रहे हैं मेहरबानी दर्द की
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    Dinesh Kumar
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    अपनी मंज़िल की जो हसरत करना
    घर से चलने की भी हिम्मत करना

    कोई तुझ को जो अमानत सौंपे
    जान दे कर भी हिफ़ाज़त करना

    कहना आसान है करना मुश्किल
    दुश्मनों से भी मोहब्बत करना

    आज बचपन में है वो बात कहाँ
    वक़्त बे-वक़्त शरारत करना

    तेरे भीतर का ख़ुदा जाग उठे
    इतनी शिद्दत से इबादत करना

    जब उसे दोस्त कहा है तुम ने
    उस के दुख दर्द में शिरकत करना

    फ़र्ज़ औलाद का होता है 'दिनेश'
    अपने माँ बाप की ख़िदमत करना
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    Dinesh Kumar
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