तीर-ए-अबरू जब कमाँ तक आ गए

उन की ज़द में जिस्म-ओ-जाँ तक आ गए

दाग़ सीरत पर लगे थे और हम
बस्ती-ए-सूरत-गराँ तक आ गए

रफ़्ता रफ़्ता कम हुआ ज़ब्त-ए-अलम
दर्द-ए-जाँ मेरी ज़बाँ तक आ गए

हम को भी इक गुल-बदन की चाह थी
हम भी कोई गुल्सिताँ तक आ गए

मंज़िल-ए-मक़्सूद भी दिखने लगी
हम जो मीर-ए-कारवाँ तक आ गए

याद आया जब हमें बचपन बहुत
हम खिलौनों की दुकाँ तक आ गए

क़ातिलों के पास थी दौलत अपार
उन के हक़ में हुक्मराँ तक आ गए

मौसम-ए-गुल सिर्फ़ यादों में है अब
उम्र गुज़री हम ख़िज़ाँ तक आ गए

— Dinesh Kumar

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