Bakhtiyar Ziya

Bakhtiyar Ziya

@bakhtiyar-ziya

Bakhtiyar Ziya shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Bakhtiyar Ziya's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

0

Content

20

Likes

26

Shayari
Audios
  • Sher
  • Ghazal

Sher

तबक़ों में रंग-ओ-नस्ल के उलझा के रख दिया ये ज़ुल्म आदमी ने किया आदमी के साथ — Bakhtiyar Ziya

Ghazal

रूदाद-ए-शौक़ ये है मिरी मुख़्तसर तमाम रानाइयों में खो गया ज़ौक़-ए-नज़र तमाम गुज़रा है गुल-बदन कोई मेरी तलाश में महकी हुई है आज मिरी रहगुज़र तमाम वो दिन भी क्या थे जब थी हवाओं से गुफ़्तुगू अब हम से बात करते हैं दीवार-ओ-दर तमाम ख़ुद अपना एहतिसाब गवारा नहीं उन्हें औरों में ऐब ढूँडते हैं दीदा-वर तमाम तन्हाइयाँ नसीब का उनवान बन गईं एक एक कर के छूट गए हम-सफ़र तमाम होने लगे हैं मेरी ख़मोशी पे तब्सिरे अब जान ले के छोड़ेंगे ये चारा-गर तमाम क्या सोच कर चले थे 'ज़िया' राह-ए-शौक़ में शायद न हो सके ये सफ़र उम्र-भर तमाम — Bakhtiyar Ziya
बिखेरे ज़ुल्फ़ रुख़ पर कौन ये बाला-ए-बाम आया ख़यालों की फ़ज़ा महकी बहारों का पयाम आया मिज़ाज-ए-यार में जब भी ख़याल-ए-इंतिक़ाम आया सर-ए-फ़िहरिस्त अपना ही गुनहगारों में नाम आया अजब हंगामा देखा हम ने साक़ी तेरी महफ़िल में कोई तिश्ना-दहन उट्ठा कोई छलका के जाम आया गिराँ-कोशी में अफ़राज़ी तन-आसानी में पामाली मशक़्क़त सुरख़-रू उट्ठी तसाहुल ज़ेर-ए-दाम आया ज़ुहूर-ए-सैर-चश्मी ही दलील-ए-कामरानी है मिरा पिंदार-ए-ना-आसूदगी ही मेरे काम आया ये मिस्रा दे दिया इक़बाल का किस शोख़-फ़ितरत ने समंद फ़िक्र के आगे 'ज़िया' मुश्किल मक़ाम आया — Bakhtiyar Ziya
दिल का सुकून आँख का तारा किसे कहें ये सोचना पड़ा है कि अपना किसे कहें ये शोर-ए-इंक़लाब ये नाक़ूस ये अज़ाँ हंगामा कौन सा है तमाशा किसे कहें रहबानियत का जिस्म से फ़सताइयत की रूह किस को रफ़ीक़ ख़ून का प्यासा किसे कहें सब मिलते-जुलते चेहरे हैं दुश्मन भी दोस्त भी क़ातिल किसे बताएँ मसीहा किसे कहें हर ज़र्रा-ए-हक़ीर है हम-दोश मेहर-ओ-माह इस पत्थरों के ढेर में हीरा किसे कहें इतना शुऊ'र दे हमें ख़ल्लाक़ ख़ैर-ओ-शर ख़ार-अो-ज़बूँ है कौन फ़रिश्ता किसे कहें मिलना था जो नसीब से वो मिल गया 'ज़िया' हसरत किसे बताएँ तमन्ना किसे कहें — Bakhtiyar Ziya
दिलबर कहा रफ़ीक़ कहा चारा-गर कहा जो कुछ भी तुम को हम ने कहा सोच कर कहा वो तुम कि हम को आज भी मुख़्लिस न कह सके और हम ने सारी उम्र तुम्हें मो'तबर कहा ये रौनक़ें जहान की मंसूब तुम से कीं फिर उन तजल्लियों को हरीम-ए-नज़र कहा पुर्सिश तिरी फ़रेब तसल्ली तिरी फ़रेब वो दिल की बात थी जिसे दुनिया का डर कहा तेरे नुक़ूश-ए-पा को बताया है कहकशाँ तेरी गली के ज़र्रों को शम्स-ओ-क़मर कहा सब मुतमइन थे देख के आज़ादियाँ मिरी मेरे ज़मीर ने मुझे बे-बाल-ओ-पर कहा उन पर तो कोई हर्फ़ न आने दिया 'ज़िया' जो गुज़री उस को गर्दिश-ए-शाम-ओ-सहर कहा — Bakhtiyar Ziya