bikhere zulf rukh par kaun ye bala-e-baam aaya | बिखेरे ज़ुल्फ़ रुख़ पर कौन ये बाला-ए-बाम आया

  - Bakhtiyar Ziya

बिखेरे ज़ुल्फ़ रुख़ पर कौन ये बाला-ए-बाम आया
ख़यालों की फ़ज़ा महकी बहारों का पयाम आया

मिज़ाज-ए-यार में जब भी ख़याल-ए-इंतिक़ाम आया
सर-ए-फ़िहरिस्त अपना ही गुनहगारों में नाम आया

'अजब हंगामा देखा हम ने साक़ी तेरी महफ़िल में
कोई तिश्ना-दहन उट्ठा कोई छलका के जाम आया

गिराँ-कोशी में अफ़राज़ी तन-आसानी में पामाली
मशक़्क़त सुरख़-रू उट्ठी तसाहुल ज़ेर-ए-दाम आया

ज़ुहूर-ए-सैर-चश्मी ही दलील-ए-कामरानी है
मिरा पिंदार-ए-ना-आसूदगी ही मेरे काम आया

ये मिस्रा दे दिया इक़बाल का किस शोख़-फ़ितरत ने
समंद फ़िक्र के आगे 'ज़िया' मुश्किल मक़ाम आया

  - Bakhtiyar Ziya

Maikashi Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Bakhtiyar Ziya

As you were reading Shayari by Bakhtiyar Ziya

Similar Writers

our suggestion based on Bakhtiyar Ziya

Similar Moods

As you were reading Maikashi Shayari Shayari