दर्द समझे न कोई दर्द का दरमाँ समझे

लोग वहशत को इलाज-ए-ग़म-ए-दौराँ समझे

दिल पे क्या गुज़री अचानक तिरे आ जाने से
इस नज़ाकत को भला क्या कोई मेहमाँ समझे

अर्श-ओ-कुर्सी से परे रखते हैं जो लांगह-ए-फ़िक्र
मंज़र-ए-दहर को हम रौज़न-ए-ज़िंदाँ समझे

वो भड़कते हुए शो'ले थे नशेमन के मिरे
दूर से आप जिन्हें सर्व-ए-चराग़ाँ समझे

यूँ भी हालात से समझौता किया है अक्सर
दुश्मन-ए-जाँ को भी हम अपना निगहबाँ समझे

— Bakhtiyar Ziya

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