Ibrat Machlishahri

Ibrat Machlishahri

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Ibrat Machlishahri shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ibrat Machlishahri's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

जब आ जाती है दुनिया घूम फिर कर अपने मरकज़ पर तो वापस लौट कर गुज़रे ज़माने क्यूँँ नहीं आते — Ibrat Machlishahri
क्यूँँ पशेमाँ हो अगर वअ'दा वफ़ा हो न सका कहीं वादे भी निभाने के लिए होते हैं — Ibrat Machlishahri

Ghazal

अपने एहसानों का नीला साएबाँ रहने दिया छीन ली छत और सर पर आसमाँ रहने दिया आज उस की बे-ज़बानी ने मुझे समझा दिया किस लिए फ़ितरत ने गुल को बे-ज़बाँ रहने दिया ज़िंदगी तो क्या असासा तक नहीं बाक़ी बचा क़ातिलों ने अब के बस ख़ाली मकाँ रहने दिया ख़ौफ़-ए-रुस्वाई से मैं ने ख़त जला डाला मगर जाने क्यूँँ उस चाँद से लब का निशाँ रहने दिया दोस्ती को अपनी मजबूरी नहीं समझा कभी फ़ासला मैं ने बराबर दरमियाँ रहने दिया बे-गुनाही की सफ़ाई दे भी सकता था मगर कुछ समझ कर मैं ने उस को बद-गुमाँ रहने दिया आग के बाज़ीगरों ने अब के खेल ऐसा खेला शहर की तक़दीर में ख़ाली धुआँ रहने दिया क्या सियासी चाल है ये ज़ालिमान-ए-वक़्त की ले लिया सब कुछ मगर इक ख़ौफ़-ए-जाँ रहने दिया चौंक चौंक उठता हूँ मैं रातों को 'इबरत' ख़ौफ़ से ख़्वाब उस ने मेरी आँखों में कहाँ रहने दिया — Ibrat Machlishahri
ये तकल्लुफ़ ये मुदारात समझ में आए हो जुदाई तो मुलाक़ात समझ में आए रूह की प्यास फुवारों से कहीं बुझती है टूट के बरसे तो बरसात समझ में आए जागते लब मिरे और उस की झपकती आँखें नींद आए तो कहाँ बात समझ में आए ली थी मौहूम तहफ़्फ़ुज़ के घरौंदे में पनाह रेत जब बिखरी तो हालात समझ में आए उँगलियाँ जिस्म के सब ऐब-ओ-हुनर जानती हैं लम्स जागे तो इक इक बात समझ में आए सैकड़ों हाथ मिरे क़त्ल में ठहरे हैं शरीक एक दो हों तो कोई बात समझ में आए कभी उतरा ही नहीं उस के तकल्लुफ़ का लिबास हो बरहना तो मुलाक़ात समझ में आए कोई आसाँ नहीं जल जल के सहर कर लेना शम्अ' बन जाओ तो फिर रात समझ में आए तुम किसी रेत के टीले पे खड़े हो 'इबरत' उट्ठे तूफ़ाँ तो फिर औक़ात समझ में आए — Ibrat Machlishahri
ऐ मौसम-ए-जुनूँ ये अजब तर्ज़-ए-क़त्ल है इंसानियत के खेतों में लाशों की फ़स्ल है अपने लहू का रंग भी पहचानती नहीं इंसान के नसीब में अंधों की नस्ल है मुंसिफ़ तो फ़ैसलों की तिजारत में लग गए अब जाने किस से हम को तक़ाज़ा-ए-अद्ल है दुश्मन का हौसला कभी इतना क़वी न था मेरे तबाह होने में तेरा भी दख़्ल है लड़ते भी हैं तो प्यार से मुँह मोड़ते नहीं हम से कहीं ज़ियादा तो बच्चों में अक़्ल है तारीख़ कह रही है कि चेहरा बदल गया इंसान है मुसिर कि वही अपनी शक्ल है दावा-ए-ख़ूँ-बहा न तज़ल्लुम न एहतिजाज किस बे-नवा-ए-वक़्त का 'इबरत' ये क़त्ल है — Ibrat Machlishahri