Bakhtiyar Ziya

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    तबक़ों में रंग-ओ-नस्ल के उलझा के रख दिया
    ये ज़ुल्म आदमी ने किया आदमी के साथ

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    आज फिर दश्त कोई आबला-पा माँगे है
    ख़ार भी ताज़गी-ए-रंग-ए-हिना माँगे है

    ज़ब्त-ए-ग़म दस्तरस-ए-आह-ए-रसा माँगे है
    ये अँधेरा तिरे आरिज़ की ज़िया माँगे है

    जाँ-दही तिश्ना-लबी आबला-पाई बे-सूद
    दश्त-ए-ग़ुर्बत तो कुछ इस के भी सिवा माँगे है

    फुंक रहा है ग़म-ए-हस्ती से वजूद-ए-इंसाँ
    ज़िंदगी अब तिरे दामन की हवा माँगे है

    आप चुपके से उसे ज़हर का पियाला दे दें
    जो रिवायत से बग़ावत का सिला माँगे है

    चाँद सीने से लगाए है मिरा नक़्श-ए-क़दम
    और सूरज मिरी साँसों की सदा माँगे है

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    जो समझना चाहिए था वो कहाँ समझा था मैं
    इस जहान-ए-रंग-ओ-बू को ख़ाक-दाँ समझा था मैं

    वक़्त की ठोकर ने ज़ाहिर कर दिए जौहर मिरे
    ज़िंदगी को अपनी संग-ए-राएगाँ समझा था मैं

    उस ने भर दी जान-ओ-दिल में इक नई ताबिंदगी
    जिस निगाह-ए-गर्म को बर्क़-ए-तपाँ समझा था मैं

    अपनी ही कोताह-दस्ती का निकल आया क़ुसूर
    कल जिसे बे-मेहरी-ए-पीर-ए-मुग़ाँ समझा था मैं

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    आज माइल-ब-करम इक बुत-ए-रा'नाई है
    सारी दुनिया मिरे दामन में सिमट आई है

    हुस्न मसरूफ़-ए-तजल्ली-ओ-ख़ुद-आराई है
    वो तमाशा ही नहीं ख़ुद भी तमाशाई है

    आप से पहले कहाँ ग़म से शनासाई थी
    मिल गए आप तो हर ग़म से शनासाई है

    इस तरह देखना जैसे मुझे देखा ही नहीं
    ये अदा आप की ख़ुद मज़हर-ए-यकताई है

    चंद कलियाँ ही नहीं सारा चमन अपना है
    कौन टोकेगा हमें किस की क़ज़ा आई है

    जिस में दहके हुए शो'ले की सी तासीर न हो
    वो 'ज़िया' शे'र नहीं क़ाफ़िया-पैमाई है

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    हर्फ़ मा'नी से जुदा हो जैसे
    ज़िंदगी कोई सज़ा हो जैसे

    बा'द मुद्दत के ये महसूस हुआ
    दर्द ही दिल की दवा हो जैसे

    और क्या होगी फ़ज़ा-ए-फ़िरदौस
    तेरे कूचे की फ़ज़ा हो जैसे

    उन निगाहों ने जो पुर्सिश की है
    आज हर ज़ख़्म हरा हो जैसे

    आप से मिल के तो कुछ ऐसा लगा
    फ़ासला और बढ़ा हो जैसे

    आह क्या उम्र गुज़ारी हम ने
    नक़्श बन बन के मिटा हो जैसे

    काँप जाता हूँ उक़ूबत से 'ज़िया'
    अब मुझे ख़ौफ़-ए-ख़ुदा हो जैसे

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    कोई ख़दशा है न तूफ़ान बला कुछ भी नहीं
    अब न ग़म्ज़ा है न अंदाज़-ओ-अदा कुछ भी नहीं

    इश्क़ कहते हैं किसे हुस्न है क्या कुछ भी नहीं
    मेरी आँखें तिरी सूरत के सिवा कुछ भी नहीं

    कब से वीरान पड़ी है मिरे दिल की दुनिया
    कोई नग़्मा किसी पायल की सदा कुछ भी नहीं

    ज़हर से कम नहीं ये साग़र-ए-मय मेरे लिए
    तू नहीं है तो ये मौसम ये फ़ज़ा कुछ भी नहीं

    तेरे चेहरे पे क़यामत है हया की सुर्ख़ी
    रंग-ए-गुल रंग-ए-शफ़क़ रंग-ए-हिना कुछ भी नहीं

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    रूदाद-ए-शौक़ ये है मिरी मुख़्तसर तमाम
    रानाइयों में खो गया ज़ौक़-ए-नज़र तमाम

    गुज़रा है गुल-बदन कोई मेरी तलाश में
    महकी हुई है आज मिरी रहगुज़र तमाम

    वो दिन भी क्या थे जब थी हवाओं से गुफ़्तुगू
    अब हम से बात करते हैं दीवार-ओ-दर तमाम

    ख़ुद अपना एहतिसाब गवारा नहीं उन्हें
    औरों में ऐब ढूँडते हैं दीदा-वर तमाम

    तन्हाइयाँ नसीब का उन्वान बन गईं
    एक एक कर के छूट गए हम-सफ़र तमाम

    होने लगे हैं मेरी ख़मोशी पे तब्सिरे
    अब जान ले के छोड़ेंगे ये चारागर तमाम

    क्या सोच कर चले थे 'ज़िया' राह-ए-शौक़ में
    शायद न हो सके ये सफ़र उम्र-भर तमाम

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    इक उम्र गुज़ारी है तब राज़ ये समझा है
    जो कुछ है मोहब्बत है दुनिया है ये उक़्बा है

    इक आप का दामन है मा'मूर मुरादों से
    इक मेरा गरेबाँ है जो ख़ून में लुथड़ा है

    इख़्लास से आरी है अब पुर्सिश-ए-ग़म ऐ दिल
    ये रस्म ही दुनिया से उठ जाए तो अच्छा है

    इस दौर-ए-कशाकश में हम हूँ कि 'ज़िया' तुम हो
    बिखरे हुए मोती हैं टूटा हुआ रिश्ता है

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    दिलबर कहा रफ़ीक़ कहा चारागर कहा
    जो कुछ भी तुम को हम ने कहा सोच कर कहा

    वो तुम कि हम को आज भी मुख़्लिस न कह सके
    और हम ने सारी उम्र तुम्हें मो'तबर कहा

    ये रौनक़ें जहान की मंसूब तुम से कीं
    फिर उन तजल्लियों को हरीम-ए-नज़र कहा

    पुर्सिश तिरी फ़रेब तसल्ली तिरी फ़रेब
    वो दिल की बात थी जिसे दुनिया का डर कहा

    तेरे नुक़ूश-ए-पा को बताया है कहकशाँ
    तेरी गली के ज़र्रों को शम्स-ओ-क़मर कहा

    सब मुतमइन थे देख के आज़ादियाँ मिरी
    मेरे ज़मीर ने मुझे बे-बाल-ओ-पर कहा

    उन पर तो कोई हर्फ़ न आने दिया 'ज़िया'
    जो गुज़री उस को गर्दिश-ए-शाम-ओ-सहर कहा

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    इतना है ज़िंदगी का तअ'ल्लुक़ ख़ुशी के साथ
    एक अजनबी हो जैसे किसी अजनबी के साथ

    सूरज उफ़ुक़ तक आते ही गहना गया यहाँ
    कुछ तीरगी भी बढ़ती रही रौशनी के साथ

    हुक्काम का सुलूक वही है अवाम से
    इब्न-ए-ज़ियाद का था जो इब्न-ए-अली के साथ

    अल्लाह रे तग़ाफ़ुल-ए-चारा-गरान-ए-वक़्त
    सुनते हैं दिल की बात मगर बे-दिली के साथ

    तबक़ों में रंग-ओ-नस्ल के उलझा के रख दिया
    ये ज़ुल्म आदमी ने किया आदमी के साथ

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