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हुनर नहीं जो हवाओं के पर कतरने का  - Dinesh Kumar

हुनर नहीं जो हवाओं के पर कतरने का
रहेगा ख़ौफ़ हमेशा ही बुझ के मरने का

हम आइनों के मुख़ातब न हो सकेंगे कभी
हमें तो ख़तरा है अपना नक़ाब उतरने का

वफ़ा की राह पे मरना भी था मुझे मंज़ूर
कोई तो होगा सबब मेरे अब मुकरने का

दराड़ बढ़ती है बढ़ जाए बद-गुमानी की
इरादा मेरा भी उन से न बात करने का

बहेलिए की कहानी से ही डरे ताइर
रहा न हौसला उन में उड़ान भरने का

न उस ने दिल से मुझे रोकने की कोशिश की
न मेरे पास समय था वहाँ ठहरने का

सफ़ेद होने लगीं हैं हमारी भी क़लमें
निशान पड़ने लगा वक़्त के गुज़रने का

फ़लक से राह-नुमाई 'दिनेश' ने की थी
सवाल उठता कहाँ ज़ुल्मतों से डरने का

Dinesh Kumar
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