Aleena Itrat

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@aleena-itrat

Aleena Itrat shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Aleena Itrat's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

अपनी मुट्ठी में छुपा कर किसी जुगनू की तरह हम तेरे नाम को चुपके से पढ़ा करते हैं — Aleena Itrat
लो हमारा जवाब ले जाओ ये महकता गुलाब ले जाओ — Aleena Itrat
जिन के मज़बूत इरादे बने पहचान उन की मंज़िलें आप ही हो जाती हैं आसान उन की — Aleena Itrat

Ghazal

लीजिए हम से बा-कमाल लोग भी आम हो गए जिन से गुरेज़ था हमें हम से वो काम हो गए आप की बद-दुआ'-ए-दिल आख़िर असर दिखा गई हम को भी इश्क़ हो गया हम भी ग़ुलाम हो गए चादर-ए-एहतियात आज सर से हवा जो ले उड़ी ज़ुल्फ़ के सारे पेच-ओ-ख़म मंज़र-ए-आम हो गए बाग़-ए-बदन में हर तरफ़ कलियाँ चटक चटक गईं बाद-ए-सबा चली तो हम ख़ुशबू ख़िराम हो गए आप से आप छट गए अब्र-ए-घनेर हिज्र के हम भी शब-ए-सियाह से माह-ए-तमाम हो गए मो'जिज़ा ये नहीं तो क्या नज़रें मिलीं न बात की फिर भी सलाम हो गए फिर भी पयाम हो गए ये कार-ए-इश्क़ का सफ़र ऐसे 'अलीना' तय हुआ दिल उन का हम ने रख लिया ख़ुद उन के नाम हो गए — Aleena Itrat
ज़िंदा रहने की ये तरकीब निकाली मैं ने अपने होने की ख़बर सब से छुपा ली मैं ने जब ज़मीं रेत की मानिंद सरकती पाई आसमाँ थाम लिया जान बचा ली मैं ने अपने सूरज की तमाज़त का भरम रखने को नर्म छाँव में कड़ी धूप मिला ली मैं ने मरहला कोई जुदाई का जो दरपेश हुआ तो तबस्सुम की रिदा ग़म को ओढ़ा ली मैं ने एक लम्हे को तिरी सम्त से उट्ठा बादल और बारिश की सी उम्मीद लगा ली मैं ने बा'द मुद्दत मुझे नींद आई बड़े चैन की नींद ख़ाक जब ओढ़ ली जब ख़ाक बिछा ली मैं ने जो 'अलीना' ने सर-ए-अर्श दुआ भेजी थी उस की तासीर यहीं फ़र्श पे पा ली मैं ने — Aleena Itrat
ये किस मुहिम पर चले थे हम जिस में रास्ते पुर-ख़तर न आए हमें नवाज़ा न वहशतों ने हमें जुनूँ के हुनर न आए मुझे बहुत तेज़ धूप दरकार है मोहब्बत के इस सफ़र में कभी कहीं सर पे साया करने कोई घनेरा शजर न आए अँधेरी शब का ये ख़्वाब-मंज़र मुझे उजालों से भर रहा है तो रात इतनी तवील हो जाए ता-क़यामत सहर न आए जहाँ हों तेरी ही रौनक़ें और तिरे नज़ारे ही चारों जानिब उस अंजुमन का पता बता दे जहाँ से मेरी ख़बर न आए जो लौट आए कोई सफ़र से तो फिर मुसाफ़िर कहाँ रहा वो वही मुसाफ़िर है जो सफ़र में है और कभी लौट कर न आए वो आसमानों में रहने वाला सुनेगा इक दिन तिरी 'अलीना' सदा को अपनी बुलंद रख तू दुआ में जब तक असर न आए — Aleena Itrat
शाम के वक़्त चराग़ों सी जलाई हुई मैं घुप अँधेरों की मुंडेरों पे सजाई हुई मैं देखने वालों की नज़रों को लगूँ सादा वरक़ तेरी तहरीर में हूँ ऐसे छुपाई हुई मैं ख़ाक कर के मुझे सहरा में उड़ाने वाले देख रक़्साँ हूँ सर-ए-दश्त उड़ाई हुई मैं क्या अँधेरों की हिफ़ाज़त के लिए रक्खी हूँ अपनी दहलीज़ पे ख़ुद आप जलाई हुई मैं लोग अफ़्साना समझ कर मुझे सुनते ही रहे दर-हक़ीक़त हूँ हक़ीक़त से बनाई हुई मैं मेरी आँखों में समाया हुआ कोई चेहरा और उस चेहरे की आँखों में समाई हुई मैं कितनी हैरान है दुनिया कि मुक़द्दर की नहीं अपनी तदबीर के हाथों हूँ बनाई हुई मैं मेरे अंदाज़ पे ता-देर 'अलीना' वो हँसा ज़िक्र में उस के थी यूँँ ख़ुद को भुलाई हुई मैं — Aleena Itrat
भिगो गई गुल-ए-एहसास आज शबनम फिर बदन के गिर्द लिपटने लगा है रेशम फिर ये किस ख़याल के कुंदन से सज गया तन-मन भरे हैं कासा-ए-हस्ती में किस ने नीलम फिर बहार बूँदें घटा ख़ुश-गवार पुर्वाई मिरे सिंगार के क्या आ गए हैं मौसम फिर बता रही हैं ये सरगोशियाँ समुंदर की कि ख़ुश्क रेत से दरिया का होगा संगम फिर कई चराग़ जो ये जल उठे हैं आँखों में सुनो जुदाई उन्हें कर न पाए मद्धम फिर तिरी जुदाई के सद में से यूँँ हुए मोहतात न इस के बा'द हुई फिर ये आँख पुर-नम फिर 'अलीना' इक दफ़ा इक आग में तपा था बदन तमाम उम्र हुई वो न आँच कम कम फिर — Aleena Itrat
लो आफ़्ताब ने सब ख़त्म इख़्तिलाफ़ किया धुआँ धुआँ थे जो मंज़र सभी को साफ़ किया शफ़क़ का लाल दुपट्टा ओढ़ा के वादी को वजूद-ए-इश्क़ का सूरज ने ए'तिराफ़ किया किसी ख़याल में ग़र्क़ाब गर्म साँसों ने दबी हुई किसी हसरत का इंकिशाफ़ किया इक आबशार की शफ़्फ़ाफ़ नर्म हलचल ने कमाल कर दिया संग-ए-बदन शिगाफ़ किया कि बाज़गश्त तो जारी है इन घटाओं की प बारिशों ने कहाँ जा के एतकाफ़ किया घटा ने चाँद का घूँघट सँवारने के लिए हिसार-ए-नूर में सौ मर्तबा तवाफ़ किया तुम्हारे ख़ौफ़ से हम मुँह छुपाए फिरते हैं ये रौशनी से अँधेरों ने ए'तिराफ़ किया — Aleena Itrat
जुनूँ में दामन-ए-दिल गरचे तार तार हुआ मगर ये जश्न सर-ए-कूचा-ए-बहार हुआ हर एक सज्दे में दिल को तिरा ख़याल आया ये इक गुनाह इबादत में बार बार हुआ समेट ली हैं मोहब्बत ने सारी परवाज़ें दिल-ओ-दिमाग़ में कैसा ये इंतिशार हुआ नहीं बुझाया हवाओं ने पहली बार चराग़ ये सानेहा तो मिरे साथ बार बार हुआ किसी के वास्ते तस्वीर-ए-इंतिज़ार थे हम वो आ गया प कहाँ ख़त्म इंतिज़ार हुआ अँधेरी शब के मुक़द्दर में इक सवेरा था ये राज़ मुझ पे दम-ए-सुब्ह आश्कार हुआ जो तुझ में डूब के देखा तो पा लिया ख़ुद को 'अलीना' यूँँ मिरा फिर मुझ पे इख़्तियार हुआ — Aleena Itrat
बस नजात-ए-ज़िंदगी तो इश्क़-ए-रूहानी में है ये सज़ा-ए-मौत सुन कर जिस्म हैरानी में है रेत पर फैला हुआ है ख़्वाब जैसा इक सराब ख़ुश्क आँखों का सुकूँ सहरा के इस पानी में है इज़्तिराबी कैफ़ियत ही इस ज़मीं का है नसीब हर घड़ी गर्दिश में है हर दम परेशानी में है कुछ ग़ुबार आँखों तक आया राज़ हम पर तब खुला क़ाफ़िला अब भी कोई इस दिल की वीरानी में है फिर किसी तूफ़ान की आमद का अंदेशा हुआ फिर क़यामत सी बपा दरिया की तुग़्यानी में है यूँँही आसानी से जीने का इरादा कर लिया ये न देखा कितनी मुश्किल ऐसी आसानी में है इस क़दर औराक़-ए-माज़ी पर चढ़ा गर्द-ओ-ग़ुबार शायद अब इन की जगह बहते हुए पानी में है अपनी मिट्टी से 'अलीना' रूह की उल्फ़त तो देख मुज़्तरिब है ये बहुत गर तू परेशानी में है — Aleena Itrat
मौसम-ए-गुल पर ख़िज़ाँ का ज़ोर चल जाता है क्यूँँ हर हसीं मंज़र बहुत जल्दी बदल जाता है क्यूँँ यूँँ अंधेरे में दिखा कर रौशनी की इक झलक मेरी मुट्ठी से हर इक जुगनू निकल जाता है क्यूँँ रौशनी का इक मुसाफ़िर थक के घर आता है जब तो अँधेरा मेरे सूरज को निगल जाता है क्यूँँ तेरे लफ़्ज़ों की तपिश से क्यूँँ सुलग उठती है जाँ सर्द-मेहरी से भी तेरी दिल ये जल जाता है क्यूँँ अब के जब लौटेगा वो तो फ़ासला रक्खेंगे हम ये इरादा उस के आते ही बदल जाता है क्यूँँ दूर है सूरज 'अलीना' फिर भी उस की धूप से बर्फ़ की चादर में लिपटा तन पिघल जाता है क्यूँँ — Aleena Itrat
पुकारते पुकारते सदा ही और हो गई क़ुबूल होते होते हर दुआ ही और हो गई ज़रा सा रुक के दो-घड़ी चमन पे क्या निगाह की बदल गया मिज़ाज-ए-गुल हवा ही और हो गई ये किस के नाम की तपिश से पोर पोर जल उठे हथेलियाँ महक गईं हिना ही और हो गई ख़िज़ाँ ने अपने नाम की रिदा जो गुल पे डाल दी चमन का रंग उड़ गया सबा ही और हो गई ग़ुरूर-ए-आफ़्ताब से ज़मीं का दिल सहम गया तमाम बारिशें थमीं घटा ही और हो गई ख़मोशियों ने ज़ेर-ए-लब ये क्या कहा ये क्या सुना कि काएनात-ए-इश्क़ की अदा ही और हो गई जो वक़्त मेहरबाँ हुआ तो ख़ार फूल बन गए ख़िज़ाँ की ज़र्द ज़र्द सी क़बा ही और हो गई वरक़ वरक़ 'अलीना' हम ने ज़िंदगी से यूँँ रंगा कि कातिब-ए-नसीब की रज़ा ही और हो गई — Aleena Itrat