ज़ब्त-ए-ग़म पर ज़वाल क्यूँ आया
शिद्दतों में उबाल क्यूँ आया
गुल से खिलवाड़ कर रही थी हवा
दिल को तेरा ख़याल क्यूँ आया
इश्क़ तो हिज्र की अलामत है
वस्ल का फिर सवाल क्यूँ आया
ऐसा बदली ने क्या किया आख़िर
सूरज इतना निढाल क्यूँ आया
सूनी आँखों में क्या मिला तुम को
झील जैसा ख़याल क्यूँ आया
उम्र भर आईने पे रखी नज़र
अक्स में फिर ये बाल क्यूँ आया
यूँही पागल हवा के छूने से
तुझ में दरिया उछाल क्यूँ आया
इश्क़ तुम को नहीं हुआ तो कहो
शाइ'री में कमाल क्यूँ आया
— Aleena Itrat















