shaam ke vaqt charaagon si jalaaii hui main | शाम के वक़्त चराग़ों सी जलाई हुई मैं

  - Aleena Itrat

शाम के वक़्त चराग़ों सी जलाई हुई मैं
घुप अँधेरों की मुंडेरों पे सजाई हुई मैं

देखने वालों की नज़रों को लगूँ सादा वरक़
तेरी तहरीर में हूँ ऐसे छुपाई हुई मैं

ख़ाक कर के मुझे सहरा में उड़ाने वाले
देख रक़्साँ हूँ सर-ए-दश्त उड़ाई हुई मैं

क्या अँधेरों की हिफ़ाज़त के लिए रक्खी हूँ
अपनी दहलीज़ पे ख़ुद आप जलाई हुई मैं

लोग अफ़्साना समझ कर मुझे सुनते ही रहे
दर-हक़ीक़त हूँ हक़ीक़त से बनाई हुई मैं

मेरी आँखों में समाया हुआ कोई चेहरा
और उस चेहरे की आँखों में समाई हुई मैं

कितनी हैरान है दुनिया कि मुक़द्दर की नहीं
अपनी तदबीर के हाथों हूँ बनाई हुई मैं

मेरे अंदाज़ पे ता-देर 'अलीना' वो हँसा
ज़िक्र में उस के थी यूँँ ख़ुद को भुलाई हुई मैं

  - Aleena Itrat

Andaaz Shayari

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