रात के पिछले पहर जिस ने जगाया क्या था
कोई आसेब-ज़दा हिज्र का साया क्या था
न तो हम समझे न की कोई वज़ाहत दिल ने
जाने अपना था कि वो शख़्स पराया क्या था
ये तो सच है कि लबों ने न कोई जुम्बिश की
पर निगाहों ने जो पैग़ाम सुनाया क्या था
यूँँ समुंदर का हवा से तो कोई रब्त न था
लहर ने फिर भी जो ये शोर मचाया क्या था
वो जो एहसास-ए-तअ'ल्लुक़ था तअल्लुक़ के बग़ैर
उस ने समझा न कभी हम ने जताया क्या था
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Aleena Itrat
our suggestion based on Aleena Itrat
As you were reading Sach Shayari Shayari