
मुतअस्सिर हैं यहाँ सब लोग जाने क्या समझते हैं
नहीं जो यार शबनम भी उसे दरिया समझते हैं
हक़ीक़त सारी तेरी मैं बता तो दूँ सर-ए-महफ़िल
मगर ये लोग सारे जो तुझे अच्छा समझते हैं
— Nirvesh Navodayan
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