Adnan Raza

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@Adnan_Raza

Adnan Raza shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Adnan Raza's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

उस की पसंद में और हम में ये फ़र्क है हम को विरासतों में दौलत नहीं मिली — Adnan Raza
वीरान रास्तों से यारी निभा रहे हैं इक गीत गा रहे हैं और चलते जा रहे हैं — Adnan Raza
रोना बनता है मुरझाए लोगों पर मुरझाना भी तो मर जाना होता है — Adnan Raza
जब से छूटी हैं किताबें हाथों में से उँगलियों ने जारी मातम कर रखा है — Adnan Raza
परवरदिगार आप के सब फैसले अजीब हैं जो तंग था वो तंग है जो ठीक था वो मर गया — Adnan Raza
हर किसी से दोस्ती निभा रहा हूँ मैं खा गई ये दो टके की नौकरी मुझे — Adnan Raza
इक फ़िल्म है नापसंद मुझ को वो फ़िल्म जो मेरी ज़िंदगी है — Adnan Raza
सूरज कि रौशनी मिली तो चाँदनी बिछड़ गई इक ख़्वाब के तले मेरा इक ख़्वाब दब के मर गया — Adnan Raza

Ghazal

दुनिया की मुश्किलात से आगे निकल गए जो लोग नफ़्सियात से आगे निकल गए तालिब तमाम उम्र किताबों में रह गया दरवेश क़ाएनात से आगे निकल गए मस्जिद की सीढ़ियों पे मेरी आँख लग गई और ख़्वाब पुलसिरात से आगे निकल गए इक अजनबी की आँख से निकले हुए सुख़न मेरे तसव्वुरात से आगे निकल गए दफ़्तर तेरा भला हो के मसरूफ़ियत में हम दिल के मुआमलात से आगे निकल गए उल्फ़त बड़े कमाल की हम सेे क़ज़ा को थी हम भी ज़रा हयात से आगे निकल गए बचपन में दिल को मारना सीखा था इस लिए हम लोग ख़्वाहिशात से आगे निकल गए लिक्खे जो उस निगाह ने माने शराब के साक़ी तेरी लुग़ात से आगे निकल गए शर्तएरज़ा में सिर्फ़ मुहब्बत की बात थी अदनान तुम तो बात से आगे निकल गए — Adnan Raza
तसव्वुर की रानी से उकता गया हूँ मैं झूठी कहानी से उकता गया हूँ बहुत ख़ूब-सूरत हैं दुनिया की चीज़ें मगर ज़िंदगानी से उकता गया हूँ निकाले हैं आँखों से ख़्वाबीदा लम्हें कि मैं ख़ुश-गुमानी से उकता गया हूँ ज़रा सा पिला दो मुझे आब ए कौसर मैं दुनिया के पानी से उकता गया हूँ तेरे दिल से जो मैं निकलने लगा हूँ तेरी बे-ध्यानी से उकता गया हूँ ऐ फ़िरदौसी हूरों बुढ़ापा दिखाओ तुम्हारी जवानी से उकता गया हूँ मेरे दोस्तों अब नया ज़ख़्म दो तुम पुरानी निशानी से उकता गया हूँ मुझे तुम मेरा नाम ले कर पुकारो मेरी जान, जानी, से उकता गया हूँ ‘रज़ा‘ अब से नफ़रत के मानी लिखूँगा मुहब्बत के मानी से उकता गया हूँ — Adnan Raza
शराबी की बोतल का ये आईना था कि मिर्ज़ा के मिसरे में ज़िक्र-ए-ख़ुदा था सुख़न-वर शराबों में डूबे हुए थे शराबों में डूबा सुख़न मिल रहा था हमारी तुम्हारी लड़ाई ही क्या थी जो था सोचा समझा सा इक फ़ैसला था दरख़्तों पे बैठे परिंद उड़ गए थे कहीं दूर कोई निशाना लगा था हमारी कहानी कहानी अलग थी हमारी कहानी में हीरो मरा था चुकाते हुए उस को गुज़री जवानी विरासत में जो हम को क़र्ज़ा मिला था कभी आशना थे कभी ग़ैर थे तुम तुम्हारे तो चेहरे में चेहरा छुपा था यक़ीं कैसे कर लें तेरी बात पर हम उसे भी तो तू ने यही सब कहा था ख़यालों में रहने लगे थे 'रज़ा' तुम जहाँ सब हक़ीक़त से बिल्कुल जुदा था — Adnan Raza
माज़ी का इक चराग़ बुझाना पड़ा मुझे भूला नहीं मैं यार भुलाना पड़ा मुझे क्या क्या समझ रहे थे उदासी को लोग तो लोगों को मुस्कुरा के दिखाना पड़ा मुझे पूछा गया कि ज़िन्दगी से कौन तंग है पूछा गया तो हाथ उठाना पड़ा मुझे इक फूल की पनाह में चाही थी ज़िन्दगी काँटों में ज़िंदगी को बिताना पड़ा मुझे आया नहीं यक़ीं मुझे उस के वजूद पर फिर यूँँ हुआ के हाथ लगाना पड़ा मुझे इक अजनबी मकान में रहने लगा था दिल इस को वहाँ से खींच के लाना पड़ा मुझे मेरे ख़याल-ए-ख़ाम में दुनिया है आइना ख़ुद को ही यार ख़ुद से मिलाना पड़ा मुझे इक नाम आ रहा था ग़ज़ल में तो ये हुआ सौ बार एक शे'र सुनाना पड़ा मुझे सौदा किसी की चाह में घाटे का कर लिया महँगा ये दिल-लगी का फ़साना पड़ा मुझे मैं भीड़ में भी उस को दिखाई दूँ इस लिए चेहरे पे इक निशान बनाना पड़ा मुझे शायद मेरे बग़ैर तेरा जी नहीं लगे कुछ इस लिए भी लौट के आना पड़ा मुझे कर्बल में अर्श से जो दिखाई नहीं दिया वो ख़ून आसमाँ में उड़ाना पड़ा मुझे किस काम की है यार तेरी दोस्ती ‘रज़ा‘ तुझ को भी हाल ख़ुद ही बताना पड़ा मुझे — Adnan Raza
खो कर फ़िराके यार में ऐसा कमाल कर चेहरे पे जो लहू है तू उस को गुलाल कर जानी तेरी ये सुरमई आँखों में क्या मज़ा आँखों कि शान ये है की रो रो के लाल कर किस्मत भी कोई चीज़ है और है भी या नहीं आओ जवाब ढूंँड ले सिक्का उछाल कर आँखों में खो गए तेरी बातों में खो गए आज़ाद कर तिलिस्म से कोई सवाल कर इतना जो खुल के आया है गैरों के सामने मेरा नहीं तो यार तू अपना ख़याल कर जाने लगे हैं आप तो जाएँ न शौक़ से कितनो को हम ने रख दिया दिल से निकाल कर मैं सच कहूँ तो यार ये पेशा अजीब है हँसते हुए ग़ज़ल पढ़ो आँसू सँभाल कर या रब उदास लोग तो बढ़ने लगे बहुत अब वक़्त है के एक दो चीज़ें हलाल कर होती है इक ग़ज़ल भी तो औलाद की तरह औलाद की तरह ही 'रज़ा' देख भाल कर — Adnan Raza