माज़ी का इक चराग़ बुझाना पड़ा मुझे

भूला नहीं मैं यार भुलाना पड़ा मुझे

क्या क्या समझ रहे थे उदासी को लोग तो
लोगों को मुस्कुरा के दिखाना पड़ा मुझे

पूछा गया कि ज़िन्दगी से कौन तंग है
पूछा गया तो हाथ उठाना पड़ा मुझे

इक फूल की पनाह में चाही थी ज़िन्दगी
काँटों में ज़िंदगी को बिताना पड़ा मुझे

आया नहीं यक़ीं मुझे उस के वजूद पर
फिर यूँ हुआ के हाथ लगाना पड़ा मुझे

इक अजनबी मकान में रहने लगा था दिल
इस को वहाँ से खींच के लाना पड़ा मुझे

मेरे ख़याल-ए-ख़ाम में दुनिया है आइना
ख़ुद को ही यार ख़ुद से मिलाना पड़ा मुझे

इक नाम आ रहा था ग़ज़ल में तो ये हुआ
सौ बार एक शे'र सुनाना पड़ा मुझे

सौदा किसी की चाह में घाटे का कर लिया
महँगा ये दिल-लगी का फ़साना पड़ा मुझे

मैं भीड़ में भी उस को दिखाई दूँ इस लिए
चेहरे पे इक निशान बनाना पड़ा मुझे

शायद मेरे बग़ैर तेरा जी नहीं लगे
कुछ इस लिए भी लौट के आना पड़ा मुझे

कर्बल में अर्श से जो दिखाई नहीं दिया
वो ख़ून आसमाँ में उड़ाना पड़ा मुझे

किस काम की है यार तेरी दोस्ती ‘रज़ा‘
तुझ को भी हाल ख़ुद ही बताना पड़ा मुझे

— Adnan Raza

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