ख़ाली घरों में गूँजती आवाज़ सुन के डर गया

सीने में दिल मकीन था वीरानियों से मर गया

लो फिर से रात हो गई इक और दिन गुज़र गया
हर रोज़ ये ही ज़िन्दगी दिल ज़िन्दगी से भर गया

मैं सुख में हूँ के दुख में हूँ मुझ को भी कुछ ख़बर नहीं
तू देख कर बता मुझे बिखरा हूँ या सँवर गया

सूरज कि रौशनी मिली तो चाँदनी बिछड़ गई
इक ख़्वाब के तले मेरा इक ख़्वाब दब के मर गया

शायद ये दोस्ती रज़ा अंजाम तक पहुँच गई
उकता गया हूँ मैं भी और दिल आप का भी भर गया

— Adnan Raza

More by Adnan Raza

Other ghazal from the same pen

See all from Adnan Raza →

Raat Shayari

Shers of raat.

All Raat Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling