तेरे दिल से जब हम उतारे गए थे
बहुत दूर तक बे-सहारे गए थे
रहे हश्र तक उन लबों में वो शीरीं
कि हम उन लबों से पुकारे गए थे
किताबों में रक्खे हुए फूल थे हम
किसी की मोहब्बत में मारे गए थे
बला क्या थी वो हिज्र की कोई पूछे
कि दिन किस तरह से गुज़ारे गए थे
दोबारा वहीं जाने में क्या बुरा है
अगर आसमाँ से उतारे गए थे
ख़राबों में आने लगा नाम उन का
शरीफ़ों से मिलने बिचारे गए थे
हमीं ने गुज़ारी है ये ज़िंदगी या
हमीं ज़िंदगी से गुज़ारे गए थे
— Adnan Raza















