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जब से छूटी हैं किताबें हाथों में से
उँगलियों ने जारी मातम कर रखा है
उँगलियों ने जारी मातम कर रखा है
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ख़ाली घरों में गूँजती आवाज़ सुन के डर गया
सीने में दिल मकीन था वीरानियों से मर गया
सीने में दिल मकीन था वीरानियों से मर गया
लो फिर से रात हो गई इक और दिन गुज़र गया
हर रोज़ ये ही ज़िन्दगी दिल ज़िन्दगी से भर गया
मैं सुख में हूँ के दुख में हूँ मुझ को भी कुछ ख़बर नहीं
तू देख कर बता मुझे बिखरा हूँ या सँवर गया
सूरज कि रौशनी मिली तो चाँदनी बिछड़ गई
इक ख़्वाब के तले मेरा इक ख़्वाब दब के मर गया
शायद ये दोस्ती रज़ा अंजाम तक पहुँच गई
उकता गया हूँ मैं भी और दिल आप का भी भर गया
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परवरदिगार आप के सब फैसले अजीब हैं
जो तंग था वो तंग है जो ठीक था वो मर गया
जो तंग था वो तंग है जो ठीक था वो मर गया
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तेरे दिल से जब हम उतारे गए थे
बहुत दूर तक बे-सहारे गए थे
बहुत दूर तक बे-सहारे गए थे
रहे हश्र तक उन लबों में वो शीरीं
कि हम उन लबों से पुकारे गए थे
किताबों में रक्खे हुए फूल थे हम
किसी की मोहब्बत में मारे गए थे
बला क्या थी वो हिज्र की कोई पूछे
कि दिन किस तरह से गुज़ारे गए थे
दोबारा वहीं जाने में क्या बुरा है
अगर आसमाँ से उतारे गए थे
ख़राबों में आने लगा नाम उन का
शरीफ़ों से मिलने बिचारे गए थे
हमीं ने गुज़ारी है ये ज़िंदगी या
हमीं ज़िंदगी से गुज़ारे गए थे
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