तसव्वुर की रानी से उकता गया हूँ

मैं झूठी कहानी से उकता गया हूँ

बहुत ख़ूब-सूरत हैं दुनिया की चीज़ें
मगर ज़िंदगानी से उकता गया हूँ

निकाले हैं आँखों से ख़्वाबीदा लम्हें
कि मैं ख़ुश-गुमानी से उकता गया हूँ

ज़रा सा पिला दो मुझे आब ए कौसर
मैं दुनिया के पानी से उकता गया हूँ

तेरे दिल से जो मैं निकलने लगा हूँ
तेरी बे-ध्यानी से उकता गया हूँ

ऐ फ़िरदौसी हूरों बुढ़ापा दिखाओ
तुम्हारी जवानी से उकता गया हूँ

मेरे दोस्तों अब नया ज़ख़्म दो तुम
पुरानी निशानी से उकता गया हूँ

मुझे तुम मेरा नाम ले कर पुकारो
मेरी जान, जानी, से उकता गया हूँ

‘रज़ा‘ अब से नफ़रत के मानी लिखूँगा
मुहब्बत के मानी से उकता गया हूँ

— Adnan Raza

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