एक मैं भी रहूँ इक जहाँ भी रहे

शंख गूँजे सदा और अज़ाँ भी रहे

इक दुआ में ही माँगी है दो और दुआ
बाप राशन ख़रीदे तो माँ भी रहे

क़ब्र में क़हक़हे हैं उसी की सनद
बोली थी "ख़ुश रहे तू जहाँ भी रहे

दिल भी जलकर बने हुस्न-ए-रंज-ओ-करम
रौशनी भी रहे और धुआँ भी रहे

पानी पी कर ही डूबेंगे मग़रूर सब
सो नदी के किनारे कुआँ भी रहे

सर पटक के अगर मुस्कुराऊँ भी मैं
चाहता हूँ जबीं पर निशाँ भी रहे

सिर्फ़ भँवरे नहीं हैं रुकावट यहाँ
फूल तोड़ो तो काँटो का ध्याँ भी रहे

— Akhil Saxena

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Gulshan Shayari

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