चलते रहना निरास हो कर भी
मुस्कुराना उदास हो कर भी
मुस्कुराना उदास हो कर भी
लिख दिया आँख को नदी उस के
मर गए प्यासे पास हो कर भी
सुनता है कौन सच यहाँ अब तो
बोलना झूठ ख़ास हो कर भी
मेरे जैसा मिला नहीं कोई
गिनती पूरे पचास हो कर भी
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तेरी बातें ग़ज़ल में हम पिरोएंगे
मिले फ़ुर्सत लिपट ख़ुद से ही रोएंगे
मिले फ़ुर्सत लिपट ख़ुद से ही रोएंगे
सुना कर लोरियाँ सब को सुलाता है
अजल की गोद में हम-तुम भी सोएंगे
समुंदर आँख में जिस के हो सिमटा
उसे बारिश ग़मों के क्या भिगोएंगे
बिछड़ना इश्क़ में मरने ही जैसा है
समझ आएगी जब अपने को खोएंगे
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हक़ीक़त उन्हें जब बताने लगे
सभी लोग उठ कर के जाने लगे
सभी लोग उठ कर के जाने लगे
बसाने में जिस को ज़माना लगा
मिरा शहर क्यूँ वो जलाने लगे
जिसे घर की लक्ष्मी बताया गया
निलामी उसी की कराने लगे
थी नफ़रत दिलों में हमारे लिए
मिरे शव पे आँसू बहाने लगे
बुरे वक़्त में काम आए नहीं
मुझे अपने भी सब बेगाने लगे
हवा में घुला ज़ह्र क्या ख़ुद से ही
घुला है ये जब कारखाने लगे
था मालूम उन को नहीं क्या है ये
थे भूखे जो माहुर भी खाने लगे
लगा टूटने हौसला जब कभी
अज़ल की ग़ज़ल गुनगुनाने लगे
उजाले में "दीपक" की रातें कटी
हुई सुब्ह उस को बुझाने लगे
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यक़ीं है कि हर कोई इज़्ज़त करेगा
मगर क्या मुझी सा मुहब्बत करेगा
मगर क्या मुझी सा मुहब्बत करेगा
चलेगा नहीं ज़ोर हम पे किसी का
बताए वो कैसे हुकूमत करेगा
पता था मुझे बा'द रुख़सत के मेरे
मुझे फिर से पाने कि मिन्नत करेगा
कहेंगे वही जो है दिल में हमारे
हुआ क्या अगर हम से नफ़रत करेगा
करूँं गौ़र क्यूँ उस कि ग़लती पे मैं भी
अभी है वो बच्चा शरारत करेगा
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