Anmol Mishra

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    ये सब पाया पागलपन से चल हट पागल
    फिर भी मुझसे सब हैं कहते चल हट पागल

    पागलपन में सोऊँ‌ जागूँ उट्ठूँ बैठूँ
    पागल हूँ मैं पागलपन से चल हट पागल

    चल हट पागल छोड़ कलाई जाने भी दे
    जाने दूँ? तुम आए कब थे? चल हट पागल

    दुनिया बोली ठीक नहीं है ये पागलपन
    मैं बोला, क्या मतलब तुझसे? चल हट पागल

    लौटी लहरें साहिल से हरदम ये कहकर
    रेत उड़ाओ हम हैं जाते चल हट पागल

    पागलपन की हद तक जाना पागलपन है
    मैं जाऊँगा हद से आगे चल हट पागल

    ख़ुद से बातें करने वाले पागल हैं गर
    दम है ख़ुद को चुप रहने दे चल हट पागल

    जब जब पागल होता हूँ तब तब लिखता हूँ
    पागल होता हूँ लिखने से? चल हट पागल

    जो नइँ होते पागल वो हो जाते पागल
    जीवन भर दुत्कारे जाते चल हट पागल
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    Anmol Mishra
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    कट गईं वो भी पतंगें जिनके माँझे तेज़ थे
    तुम भी ज़्यादा उड़ रहे हो हश्र अपना सोच लो
    Anmol Mishra
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    ये हुनर मेरे भी अंदर आ गया है दोस्तों
    दिल पे लगती बात को बस मुस्कुरा कर टाल दूँ
    Anmol Mishra
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    किसी को रात में सर पर मयस्सर छत नहीं होती
    किसी छत के भी सर पे छत बनी होती है क्या समझे
    Anmol Mishra
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    तुम्हें वो मिल नहीं पाईं उन्हें तुम मिल नहीं पाए
    कन्हैया साथ में क्यों फिर सदा तस्वीर दिखती है
    Anmol Mishra
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    आओ बैठो मेरे घर में
    सहते ढहते इस खंडर में

    बाहर आंँधी बिजली चमके
    अंदर आओ इस मंज़र में

    पीठ हुई क्यूंँ गीली मेरी
    ख़ून लगा था क्या ख़ंजर में

    खोया तुमने प्यार भरोसा
    ढूंँढो गुम है किस जर्जर में

    तूने जिससे प्रेम किया था
    वो तो छूट गया नइहर में

    जोगी धूल उड़ाकर बोला
    माटी डालो इस बंजर में
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    Anmol Mishra
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    शमा जलाने को सब हैं कहते बहुत अँधेरा बिखर रहा है
    हटा दो ज़ुल्फ़ें हुआ उजाला जरा सा हँस दो हुआ सवेरा
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    ये लाल शामें ये लाल अंबर ये लाल सूरज चमक रहा है
    मुझे बता दो कहाँ है खोई तिरे लबों की ये सुर्ख़ लाली
    Anmol Mishra
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    कुछ रिश्ते कुछ रिश्तों जैसे होते नइंँ
    रख लो सिर मेरे कंधे पर रोते नइंँ

    ख़ुद ही मारो ख़ुद ही ख़ुद में मर जाओ
    ख़ुद की लाशें ख़ुद कंधों पर ढोते नइंँ

    क़समें वादे झूठे मूठे चक्कर हैं
    ख़ातिर इनकी हम जैसे को खोते नइंँ

    दिन भर तुमको नींद बहुत ही आती है
    जगने वाले रात पहर भर सोते नइंँ

    चढ़ जाने दो रंग को रेशों रेशों पर
    कच्चा रंग है ऐसे कपड़े धोते नइंँ

    सींचो अपने ख़ून पसीने से मिट्टी
    ऐसे ही बंजर में दाने बोते नइंँ

    तेरी आँखें उस पर गहरी सागर सी
    डूब मरोगे इन आँखों में गोते नइंँ
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    Anmol Mishra
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    तुम्हारा दिल है बड़ा सा दरबा जहांँ कबूतर फड़क रहे हैं
    कहांँ है खोई हमारी चिट्ठी कहांँ कबूतर भटक रहा है
    Anmol Mishra
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