आओ बैठो मेरे घर मेंसहते ढहते इस खंडर मेंबाहर आंँधी बिजली चमकेअंदर आओ इस मंज़र मेंपीठ हुई क्यूँंँ गीली मेरीख़ून लगा था क्या ख़ंजर मेंखोया तुम ने प्यार भरोसाढूंँढो गुम है किस जर्जर मेंतू ने जिस से प्रेम किया थावो तो छूट गया नइहर मेंजोगी धूल उड़ाकर बोलामाटी डालो इस बंजर में— Anmol Mishra