एक किताब थी पास मेरे वही जिसे पढ़ने में आलस आता था लगता था जो हमेशा डेस्क पर रखी रहेगी धूल खाएगी कहाँ जाएगी जाएगी नहीं कहीं कौन पढ़ेगा उस किताब को जिसमें भाव का अभाव है झूठ का प्रभाव है फिर एक दिन एक झूठा मुझसे वो किताब ले गया
वो साथ था आबाद था जैसे तैसे निकला ही था ख़ुद से ख़ुद को पीछे छोड़ कर पर एक आदत से निकलने के लिए दूसरी आदत डाल ली डाल ली फिर से आदत कुछ अटपटे से नाम देने की काम देने की मेरी सुबह मेरी शाम देने की आदत डाल ली फिर से मैंने निकाल ली मैंने वो पोशाकें जो कभी दोबारा नहीं पहनने का मन बनाया था तन नहीं सजाया था सालों से मैंने अरसे बीत गए थे ख़ुद को दूसरे की आँखों के पानी में देखे पर फिर भी आदत डाल ली मैंने फिर से कुछ केशों को गालों पर सजाने की फिर से इस सीने की इक तकिया बनाने की फिर से अक्सर रात में घर देर जाने की ग़लतियाँ सारी किसी की भूल जाने की आदत डाल ली फिर से