“किताब”
एक किताब थी पास मेरे
वही जिसे पढ़ने में आलस आता था
लगता था जो हमेशा डेस्क पर रखी रहेगी
धूल खाएगी
कहाँ जाएगी
जाएगी नहीं कहीं
कौन पढ़ेगा उस किताब को
जिसमें भाव का अभाव है
झूठ का प्रभाव है
फिर एक दिन एक झूठा
मुझसे वो किताब ले गया
कहाँ हमसे दुआ होगी कहाँ नौहे पढ़ूँगा अब
तुम्हें सब माँग लेंगे हम खड़े मेहराब देखेंगे
"आदत"
वो साथ था आबाद था
जैसे तैसे निकला ही था ख़ुद से ख़ुद को पीछे छोड़ कर
पर एक आदत से निकलने के लिए दूसरी आदत डाल ली
डाल ली फिर से आदत कुछ अटपटे से नाम देने की
काम देने की मेरी सुबह मेरी शाम देने की
आदत डाल ली फिर से मैंने
निकाल ली मैंने वो पोशाकें जो कभी दोबारा नहीं पहनने का मन बनाया था
तन नहीं सजाया था सालों से मैंने
अरसे बीत गए थे ख़ुद को दूसरे की आँखों के पानी में देखे
पर फिर भी आदत डाल ली मैंने
फिर से कुछ केशों को गालों पर सजाने की
फिर से इस सीने की इक तकिया बनाने की
फिर से अक्सर रात में घर देर जाने की
ग़लतियाँ सारी किसी की भूल जाने की
आदत डाल ली फिर से
मृगतृष्णा की सच्चाई को झूठ बताया करते हैं
कैसे कैसे लोग हैं जो पत्थर पिघलाया करते हैं
बहुत पथरा गया हूँ मैं
समझ गर आ गया हूँ मैं
जहाँ तुम याद करती थी
वहीं भूला गया हूँ मैं
ये तोहमत की दरारें हैं
बहुत जोड़ा गया हूँ मैं
मेरी साँसें नहीं रुकतीं
तभी उकता गया हूँ मैं
सही बातें नही हैं ये
ग़लत परखा गया हूँ मैं
मैंने सुना टूटे मकाँ आगे नहीं ढहते
मेरे दिल-ए-सहरा में क्यों आँसू नहीं बहते
लड़की बिना इक जीत के लड़की ही रहती है
लड़के हमारे हार कर लड़के नहीं रहते
मुझे सच में झूठों से बहला रहा है
समंदर में नदियों से नहला रहा है
हैं नासूर सारे तेरे ही तो मुझमें
ख़ता जानकर भी तू सहला रहा है