Lalit Pandey

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    चाँद सूरज की चमक और सितारा देखो
    बाम से उतरो उतरते ही दुबारा देखो

    पहले देखो मिरी आँखों में मुहब्बत अपनी
    कुछ न दिख पाए तो दरिया का किनारा देखो

    जो तरफ़दार थे अख़लाक़ के उन सबके सिवा
    कैसे कैसों को दिया उसने सहारा देखो

    माँगता कौन बग़ावत की पज़ीराई पर
    कैसे करते हैं यहाँ लोग गुज़ारा देखो

    हो ख़सारा तो बताते हैं मुनाफ़ा ये लोग
    और मुनाफ़े से ये कहते हैं ख़सारा देखो
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    हुस्न और इश्क़ की ग़फ़लत से डरा करते हैं
    मेरे ग़म-ख़्वार अक़ीदत से डरा करते हैं

    ज़ीस्त की अस्ल हक़ीक़त से डरा करते हैं
    अब तो रहगीर भी हिजरत से डरा करते हैं

    दिल्लगी ने नहीं आदत ने डराया हमको
    लोग सिगरेट से नहीं लत से डरा करते हैं

    आप इज़हार ए मुहब्बत से डरा करते थे
    माज़रत हम तो मुहब्बत से डरा करते हैं

    उन को बचपन में कभी माँ ने डराया होगा
    वो सभी मर्द जो औरत से डरा करते हैं

    जिस्म को बाप की दस्तार समझने वाले
    पास आकर भी शरारत से डरा करते हैं
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    गर तअल्लुक़ हो किसी से तो रहे फिर उम्रभर
    परवरिश के साथ मेरी सोच भी कुछ और है
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    इस ज़िंदगी को मौत से भी बद-तरीन देख
    का'बे को जा रहे हैं यहाँ मुंकिरीन देख

    इक बार उसने आँख दिखाई थी मुझको दोस्त
    नीचे है उसकी आज तलक आस्तीन देख

    वो दोस्ती निभाएगा इस दुश्मनी के बाद
    अपने रक़ीब पर कभी करके यक़ीन देख

    मासूमियत भी मिट गईं नादानियाँ भी ख़त्म
    इक हादसे ने कर दिया कितना ज़हीन देख

    चालाकियाँ ये ख़्वाहिशें आदम से कहती हैं
    बेहतर को पा लिया है तो अब बेहतरीन देख

    फूलों का गोश्त नोच के काँटों को चुन लिया
    ये तितलियाँ भी ख़ून की हैं शाइक़ीन देख

    स्कूल के दिनों में जिन्हें देखते न थे
    वो लड़कियाँ भी हो गईं कितनी हसीन देख
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    इश्क़ में हो के जो बदनाम नहीं आते हैं
    उनके प्यालों में कभी ज़ाम नहीं आते हैं

    लोग जो दौड़ यहाँ दौड़ रहे हैं हर पल
    मुझको ये सब रविश-ए-आम नहीं आते हैं

    गाँव छोड़ा तो कटी रात ज़मीं पे मेरी
    इस बड़े शहर में ख़य्याम नहीं आते हैं

    रूह को लोग बनाने में लगे हैं पत्थर
    अब अहिल्या के लिये राम नहीं आते हैं

    शादी से पहले सभी लोग यही कहते हैं
    मुझको कोई भी बुरे काम नहीं आते हैं
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    सबका यक़ीन बढ़ने लगा ख़ाकसार पर
    यानी कि चोट पड़ने लगी है दरार पर

    जिसकी रखी हो नींव यहाँ पासवर्ड से
    कैसे मैं ऐतिबार करूँ ऐसे प्यार पर

    वो शख़्स जिसने रोज़ मुझे अनसुना किया
    वो शख़्स कैसे लौट गया इक पुकार पर

    चर्चे हमारी हार के होने लगे थे सो
    सबने हमारा नाम लिखा इश्तिहार पर

    इक लड़की की पसंद से शादी हुई है आज
    यानी कि दीप जलने लगे घर के द्वार पर

    मैंने ज़बान सौंप दी है उसके हाथ में
    वो भी क़रार करने लगी है क़रार पर

    वो मेरे साथ उतना ठहरती है जितना देर
    इक बूँद ठहरी रहती है बिजली के तार पर

    कुछ इस तरह वो होंठ पे रखकर गया है होंठ
    रक्खे हों जैसे हाथ किसी ने गिटार पर

    फिर से जवाब आने लगे हैं सवाल के
    फिर से शराब चढ़ने लगी है ख़ुमार पर
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    बंजर ज़मीं पे फूल उगाना शुरू करो
    दीवानो जाओ इश्क़ निभाना शुरू करो

    क़िस्मत बदल गई सभी की उसने जब कहा
    सारे नुजूमी हाथ दिखाना शुरू करो

    पीने लगी हैं तितलियाँ ख़ुशबू गुलाब की
    इन तितलियों को यार उड़ाना शुरू करो

    तुम देखभाल कर नहीं पाए बुज़ुर्गों की
    तो बदनसीब पेड़ लगाना शुरु करो

    दिखने लगेंगी कहकहों की सब उदासियाँ
    इक बार मसख़रों को हँसाना शुरू करो

    रक्खोगे जो सँभाल के खो जाएगा वही
    जो पास में हैं उसको गँवाना शुरू करो
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    निकलकर क़ैद से बाहर नहीं आता
    मेरे दर पर मेरा परवर नहीं आता

    खिलौने ख़ुद बनाकर खेलता था मैं
    सभी के गाँव जादूगर नहीं आता

    इशारों पर किसी के नाचता है वो
    मेरे पत्तों में जो नम्बर नहीं आता

    तुम्हें इस ज़िंदगी का ग़म नहीं यानी
    तुम्हारी दाल में पत्थर नहीं आता

    हमारे हिस्से में आवारगी आई
    हमारे हिस्से कोई घर नहीं आता
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    Lalit Pandey
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    वो अपने घर की बड़ी बेटी थी सो मैंने भी
    बिछड़ते वक़्त उसे बेवफ़ा नहीं बोला
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    वो दोस्ती निभाएगा इस दुश्मनी के बाद
    अपने रक़ीब पर कभी करके यक़ीन देख
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