निकलकर क़ैद से बाहर नहीं आता
मेरे दर पर मेरा परवर नहीं आता
खिलौने ख़ुद बना कर खेलता था मैं
सभी के गाँव जादूगर नहीं आता
इशारों पर किसी के नाचता है वो
मेरे पत्तों में जो नंबर नहीं आता
तुम्हें इस ज़िंदगी का ग़म नहीं या'नी
तुम्हारी दाल में पत्थर नहीं आता
हमारे हिस्से में आवारगी आई
हमारे हिस्से कोई घर नहीं आता
— Lalit Pandey















