लड़कपन में यतीमों को बड़ों की याद आती है
सड़क पे सोने वालों को छतों की याद आती है
ये मुमकिन है कि मैं उस को किसी दिन याद आऊँगा
निकल आएँ घरों से तो घरों की याद आती है
उठा कर फेंक देता हूँ अचानक सब गिलासों को
मैं प्यासा हूँ मगर मुझ को घड़ों की याद आती है
सलीक़ा साथ चलने का मुझे आया है जिस दिन से
उसी दिन से मुझे बिछड़े हुओं की याद आती है
किसे मालूम है हम बुतपरस्तों का अकेलापन
मैं वो दीवार हूँ जिस को बुतों की याद आती है
— Lalit Pandey















