सबने यहाँ पे जिस्म छुआ खेल खेल में
और इश्क़ का मज़ाक़ बना खेल खेल में
मैं रोज़ उस ही खेल में आता हूँ हार कर
इक दिन जिसे मैं जीत गया खेल खेल में
चालाकियों को हम ने शरारत समझ लिया
सचमुच ख़ुदाया क्या न सहा खेल खेल में
बस इक खिलौना तोड़ने वाली ने देखिए
कितने दिलों को तोड़ दिया खेल खेल में
वहशत मिली है हिज्र मिला और मिला सफ़र
क्या क्या गिनाऊँ क्या न मिला खेल खेल में
तन्हाइयों का जब भी गया पूछने सबब
उस ने हमारे मुँह पे कहा खेल खेल में
उस के लिए जो खेल था अपनी थी ज़िंदगी
सो अपना खेल ख़त्म हुआ खेल खेल में
— Lalit Pandey















