करने में मुझ को नाम बहुत देर हो गई
पाने में ये मक़ाम बहुत देर हो गई
अब आइए न पास मुहब्बत के नाम पर
अब डालिए न जाम बहुत देर हो गई
अब तू शिकस्त देख के चालाकियाँ न कर
मेरे नमक-हराम बहुत देर हो गई
मुझ को पता है कौन मेरा साथ दे गया
करिए न अब सलाम बहुत देर हो गई
फिर ये हुआ कि जंग छिड़ी सब्र के ख़िलाफ़
कहने लगे ग़ुलाम बहुत देर हो गई
मैं रोज़ सुब्ह लड़ के पलटता था शाम को
पर मुझ को एक शाम बहुत देर हो गई
भाई के हाथ लाल हैं भाई के ख़ून से
सचमुच में राम राम बहुत देर हो गई
— Lalit Pandey















