Lalit Pandey

Lalit Pandey

@lalit654321pandey

Lalit Pandey shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Lalit Pandey's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

बस इस लिए कि ख़ुद-कुशी भी हादसा लगे गाड़ी चला के ले गया उजलत के साथ साथ — Lalit Pandey
घर बँट गया तो बाप भी बाँटा गया है सो गर्दन भी काट दी गई हैं उँगलियों के बा'द — Lalit Pandey
गर तअल्लुक़ हो किसी से तो रहे फिर उम्रभर परवरिश के साथ मेरी सोच भी कुछ और है — Lalit Pandey
वो अपने घर की बड़ी बेटी थी सो मैं ने भी बिछड़ते वक़्त उसे बे-वफ़ा नहीं बोला — Lalit Pandey
वो दोस्ती निभाएगा इस दुश्मनी के बा'द अपने रक़ीब पर कभी कर के यक़ीन देख — Lalit Pandey

Ghazal

इस ज़िंदगी को मौत से भी बद-तरीन देख का'बे को जा रहे हैं यहाँ मुंकिरीन देख इक बार उस ने आँख दिखाई थी मुझ को दोस्त नीचे है उस की आज तलक आस्तीन देख वो दोस्ती निभाएगा इस दुश्मनी के बा'द अपने रक़ीब पर कभी कर के यक़ीन देख मासूमियत भी मिट गईं नादानियाँ भी ख़त्म इक हादसे ने कर दिया कितना ज़हीन देख चालाकियाँ ये ख़्वाहिशें आदम से कहती हैं बेहतर को पा लिया है तो अब बेहतरीन देख फूलों का गोश्त नोच के काँटों को चुन लिया ये तितलियाँ भी ख़ून की हैं शाइक़ीन देख स्कूल के दिनों में जिन्हें देखते न थे वो लड़कियाँ भी हो गईं कितनी हसीन देख — Lalit Pandey
यार उस का भी सितमगर था सुना है मैं ने पर बिछड़ने का उसे डर था सुना है मैं ने बाप के हाथ में बँटवारे के कुछ काग़ज़ थे भाई के हाथ में ख़ंजर था सुना है मैं ने एक रस्ता जो बयाबान नज़र आता है इस बयाबान में इक घर था सुना है मैं ने आप के साथ कोई शख़्स हुआ करता था आप के साथ मुक़द्दर था सुना है मैं ने गुमशुदा लोग किसी रोज़ पलट आते थे हर मुसाफ़िर का कोई दर था सुना है मैं ने हम भी इक सुब्ह अचानक से ठहर जाएँगे एक इंसान सिकंदर था सुना है मैं ने ये जिसे छू के बनाया है 'ललित' दिल उस ने ये कई साल से पत्थर था सुना है मैं ने — Lalit Pandey
सबका यक़ीन बढ़ने लगा ख़ाकसार पर या'नी कि चोट पड़ने लगी है दरार पर जिस की रखी हो नींव यहाँ पासवर्ड से कैसे मैं ऐतिबार करूँँ ऐसे प्यार पर वो शख़्स जिस ने रोज़ मुझे अनसुना किया वो शख़्स कैसे लौट गया इक पुकार पर चर्चे हमारी हार के होने लगे थे सो सबने हमारा नाम लिखा इश्तिहार पर इक लड़की की पसंद से शादी हुई है आज या'नी कि दीप जलने लगे घर के द्वार पर मैं ने ज़बान सौंप दी है उस के हाथ में वो भी क़रार करने लगी है क़रार पर वो मेरे साथ उतना ठहरती है जितना देर इक बूँद ठहरी रहती है बिजली के तार पर कुछ इस तरह वो होंठ पे रख कर गया है होंठ रक्खे हों जैसे हाथ किसी ने गिटार पर फिर से जवाब आने लगे हैं सवाल के फिर से शराब चढ़ने लगी है ख़ुमार पर — Lalit Pandey