अब जाइए भी जान कहीं और जाइए
है मतलबी जहान कहीं और जाइए
सादा-दिली के सामने सादा-दिली रखें
करना है गर गुमान कहीं और जाइए
माना कि देखी आपने दुनिया क़रीब से
पर बाँटिए न ज्ञान कहीं और जाइए
मेरी कमी पे तंज़ को आए हैं आप गर
तो होने मेहरबान कहीं और जाइए
मैं कह चुका हूँ यार मेरी आख़िरी ग़ज़ल
अब बंद है दुकान कहीं और जाइए
बोले मुख़ालिफ़त में ललित किस तरह से आप
गिरता है अब मकान कहीं और जाइए
— Lalit Pandey















