हर सड़क कच्ची है हम गाड़ी चलाएँ किस तरह
बे-वफ़ा हैं लोग तो फिर दिल लगाएँ किस तरह
जिस्म-ओ-जाँ की क़ल्ब में है वहशत-ए-आशुफ़्तगी
उस गली उस रास्ते से आऐं जाएँ किस तरह
इन नईं नस्लों में कोई क़ाबिल-ए-उल्फ़त नहीं
हर निवाले में है पत्थर इस को खाएँ किस तरह
उस को पाने के लिए कैसे स्वयं को खोएँ हम
छोटी संख्या से बड़ी संख्या घटाएँ किस तरह
जिन की राहों का हमीं काँटा बने बैठे हैं आज
उन सभी की राह से काँटा हटाएँ किस तरह
बस सभी को आबगीनों की अलामत चाहिए
कौन सोचे दास्ताँ में सच दिखाएँ किस तरह
— Lalit Pandey














