ख़ुदा ने ही किस्मत बनाई हमारी
    हमारे ही हाथों में उल्फ़त नहीं है
    Prashant Rao chourase
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    तुम्हारा ख़्वाब तो पूरा हो कम से कम
    हमारा ज़ख़्म तो भरने नहीं वाला
    Prashant Rao chourase
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    जो दिन में छटपताए तो पिता का दर्द समझे
    दो रुपए ख़ुद कमाए तो पिता का दर्द समझे
    Prashant Rao chourase
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    उड़ाता वो धुएँ को ख़ुद ही बादल हो गया आशिक़
    दुआ करता रहा फिर सच मे पागल हो गया आशिक़

    वफ़ा कर के मुहब्बत में मिला ही क्या बताऊँ मैं
    उसी का ज़िक्र फिर से और घायल हो गया आशिक़
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    Prashant Rao chourase
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    मुझे पहले समझ फिर कोई अंदाज़ा लगा दोस्त
    नहीं समझा तो खुद के आगे आईना लगा दोस्त

    बड़ी रफ़्तार से निकला है मेरे दिल से इक शख़्स
    नहीं वापस वो आने वाला दरवाज़ा लगा दोस्त
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    Prashant Rao chourase
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    मैं कितना बदनसीब हूँ
    वो समझा बस रक़ीब हूँ

    हुआ सभी से दूर पर
    किसी के मैं क़रीब हूँ

    सुना दिया जो अपना दर्द
    उसे लगा सलीब हूँ

    दवा है ये मिरी ग़ज़ल
    मैं ख़ुद का ही तबीब हूँ

    नहीं हूँ जौन सा मगर
    मैं भी बहुत अजीब हूँ
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    Prashant Rao chourase
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    मुहब्बत रास आ जाए हमें ये सोचकर हम ने
    जिसे भी चाहा है पहली मुहब्बत की तरह चाहा
    Prashant Rao chourase
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    क़ैद है तस्वीरें आँखों में मेरी
    मैं भी आँखों में किसी के क़ैद हूँ
    Prashant Rao chourase
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    तुम्हारी याद आती है हमेशा मैं ही कहता हूँ
    कभी तुम भी मुझे बोलों तुम्हारी याद आती है
    Prashant Rao chourase
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    उसका पहला इश्क़ हूँ मैं और मेरा है आख़िरी इश्क़
    वो न तो ये जानती है वो न तो ये मानती है
    Prashant Rao chourase
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