ग़ौर से देख हर गली को यहाँ
    सबसे कुछ बैर है सभी को यहाँ

    हर क़दम इक नए अंधेरे से
    लड़ना पड़ता है रौशनी को यहाँ

    सिर्फ़ कांटे हुए किसी का नसीब
    और गुलशन मिला किसी को यहाँ

    हर घड़ी मौत मौत करके सब
    रौंद देते हैं ज़िंदगी को यहाँ

    अपनी आवाज़ में ही गुम हैं सभी
    कौन सुनता है ख़ामोशी को यहाँ

    दिल में कुछ है ज़ुबान पर कुछ है
    कैसे पहचानें आदमी को यहाँ

    भूल कुछ हो गई अनन्या से
    सच समझ बैठी दिल्लगी को यहाँ
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    Ananya Rai Parashar
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    ये जो हम तेरी राह देखते हैं
    ख़ुद के मिटने की चाह देखते हैं
    Ananya Rai Parashar
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    दिल किसी से भी अगर लगता है
    फिर तो दीवार से सर लगता है

    एक बस तुमको ही चाहूँ लेकिन
    मुझको इस इश्क़ से डर लगता है

    तेरी यादों से सजाती हूँ जब
    मुस्कुराता हुआ घर लगता है

    हमसफ़र तू जो नहीं है मेरा
    रूठा रूठा सा सफ़र लगता है

    मीठे मीठे से ख़्याल आते हैं
    तेरी बातों का असर लगता है

    अब नहीं है वो 'अनन्या' तेरा
    सच नहीं है ये मगर लगता है
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    Ananya Rai Parashar
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    "ये न पूछो कैसे जाकर मैंने कोई गीत लिखा है"
    ये न पूछो कैसे जाकर मैंने कोई गीत लिखा है
    दिल के तारो को छेड़ा है और दुखों का तोड़ लिखा है
    जीवन में जो कुछ होता है गुणा घटाना जोड़ लिखा है
    हँसी ठिठोली और आँसू है फिर दर्दों का सार लिखा है
    नाम तुम्हारा हर पन्ने पर जाने कितनी बार लिखा है
    हमने अपनी हार लिखी है और तुम्हारी जीत लिखा है
    ये ना पूछो कैसे जाकर मैंने कोई गीत लिखा है
    तुलसी की पाती पर मैंने दिल के सब मनुहार लिखा है
    प्यार हमारा अमर रहे ये क्या क्या है स्वीकार लिखा है
    इन अधरों से उन अधरों का जो भी है संवाद लिखा है
    अपने दिल के इन भावों का एक सरल अनुवाद लिखा है
    ये रिश्ता है अपना कितना पावन और पुनीत लिखा है
    ये न पूछो कैसे जाकर मैंने कोई गीत लिखा है
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    Ananya Rai Parashar
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    तुम मुझे इतना आम मत समझो
    हर किसी के लिए नहीं हूँ मैं
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    क्यों परेशां हों किसी बात से हम
    कुछ ना रहता है हमेशा के लिए
    Ananya Rai Parashar
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    उसने जब भी कभी मोहब्बत की
    जैसे मुझपे कोई इनायत की

    डूब जाते हैं अहल-ए-दिल इसमें
    मैं वही झील हूँ मोहब्बत की

    फिर मेरे रू-ब-रू वो आया है
    फिर ख़बर हो गई क़यामत की

    होंठ पर होंठ रख दिए मैंने
    क्या ज़रूरत है अब इजाज़त की

    जब तेरा लम्स हो गया हासिल
    किसको परवाह कोई जन्नत की

    ऐसे मंज़िल नहीं मिली मुझको
    मैने पाने को ख़ूब मेहनत की

    ग़मज़दों ने सजाई थी महफ़िल
    और मैने वहाँ निज़ामत की

    आज़माओ ना तुम 'अनन्या' को
    हद होती है इक शराफ़त की
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    Ananya Rai Parashar
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    इल्म इतना तो मुझे हासिल है
    बे-सबब कोई बहस अच्छी नहीं
    Ananya Rai Parashar
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    बताओ बताओ कहाँ जा रहे हो
    न हमको सताओ कहाँ जा रहे हो

    ज़रा देर ठहरो करो बात मुझसे
    नज़र मत चुराओ कहाँ जा रहे हो

    जो रक्खा है तुमने मेरी रहगुज़र पर
    वो पत्थर हटाओ कहाँ जा रहे हो

    बड़े दिन पे मिलना हुआ है हमारा
    तबीयत सुनाओ कहाँ जा रहे हो

    यहाँ हम सफ़र से ज़रूरी है क़ुरबत
    ये दूरी मिटाओ कहाँ जा रहे हो

    ऐ साक़ी कभी तो वो जाम-ए-इनायत
    हमें भी पिलाओ कहाँ जा रहे हो
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    Ananya Rai Parashar
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    पीपल वाली छाँव रखी है ख़ुश्बू बिखरी मिट्टी में
    पूरा-पूरा गाँव धरा है मेरी माँ की चिट्ठी में
    Ananya Rai Parashar
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