एक ये भी तल्ख़ सच है ज़िंदगी का मेरे दोस्त
शख़्स कोई सिर्फ़ मेरा तो कभी होता नहीं
शख़्स कोई सिर्फ़ मेरा तो कभी होता नहीं
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फिर मुहब्बत करने की जब सोची मैं ने
यार फिर हिजरत की आई याद मुझ को
यार फिर हिजरत की आई याद मुझ को
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वो मुझ को जिस तरह से दुआएँ था दे रहा
मैं तो समझ गया ये क़यामत की रात हैं
मैं तो समझ गया ये क़यामत की रात हैं
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अब उसे मेरी ज़रूरत जो नहीं है
ये कहानी आगे बढ़नी तो नहीं है
ये कहानी आगे बढ़नी तो नहीं है
अब उसे मिल जो गए हैं दोस्त अच्छे
यार जो थी बात बननी वो नहीं है
इस क़दर उस ने जो ख़ुद को अब है बदला
यार वो जो थी न अब वो तो नहीं है
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अब मुझे उस पर यक़ीन इतना रहा है
पानी तपती रेत में जितना रहा है
पानी तपती रेत में जितना रहा है
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चुराया है किसी ने मह-जबीं मुझ से
'इशा ने रौशनी को हर लिया जैसे
'इशा ने रौशनी को हर लिया जैसे
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