तू ख़याल रख अपना मैं ख़याल रख लूँगा
    है तुझे मोहब्बत तो मैं मिसाल रख लूँगा

    मैं अगर तुझे दूँगा जो जवाब भी अपने
    तो तेरे भी होंठों पे मैं सवाल रख लूँगा
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    Umashankar Lekhwar
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    रूठ सा गया है कुछ मुझसे ये नज़ारा भी
    रह गया न ख़्वाबों में अब मेरे सितारा भी

    वो है चाँद जिससे है ये मेरा जहाँ रोशन
    मैं चमक भी जाऊँ तो बन सकूँ न तारा भी
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    Umashankar Lekhwar
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    थी कभी चाहत किसी की उस जुनूँ में अब नहीं हैं
    क्यों करें फिर हम तमन्ना वो हमारे जब नहीं हैं

    ख़ुश-नसीबी है ये टीके की कि माथे पे सजा है
    ये मेरी है बद-नसीबी क्यों वहाँ ये लब नहीं हैं

    नींद मुझको आ भी जाएगी मगर फिर ये सितम है
    वो वहाँ भी आ रही है ख़्वाब उसके कब नहीं हैं

    चाहते हैं जो तुम्हें सब और तुमको ये गुमाँ है
    ख़ैर देखो वो सभी के हैं तुम्हारे सब नहीं हैं
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    Umashankar Lekhwar
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    मेरे वो ऐब हर इक दिन उसे भी तो सताते थे
    जिसे भी पूछता था, वो ग़लत उसको बताते थे

    मिला जब भी उसे, फिरता रहा हर रोज़ आवारा
    मुझे मिल ही न पाए रास्ते जो उसको जाते थे

    उसे भी याद करता मैं, निशानी हो अगर कोई
    सँभाले हैं अभी तक वो मुझे जो ख़्वाब आते थे

    अगर वो फिर कभी आए ख़यालों में तो पूछूँगा
    तेरे वो ख़्वाब अब तक किस लिए मुझको जगाते थे

    किसी को क्या खबर कैसे बिता लेते हैं अपने दिन
    बिना उनके कि जिनपर वो हर इक दिन हक़ जताते थे
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    Umashankar Lekhwar
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    गुनाहों की किसी फ़ेहरिस्त में जब नाम होते हैं
    जिएँ कैसे अगर सर पे कई इल्ज़ाम होते हैं

    लुटा देते हैं सब अपना जिन्हें कुछ मिल नहीं पाता
    बुरा कहते उन्हें है लोग, जो नाकाम होते हैं

    दिखाते हैं उन्हें जब लोग अपनी कामयाबी को
    कहाँ जाते हैं वो, जो शख़्स फिर नाकाम होते हैं

    उन्हें सब जानते हैं और उनका नाम लेते हैं
    मिले मंज़िल अगर तो नाम, या बदनाम होते हैं

    हमें इक शख़्स जो वो मिल न पाया, नाम से उसके
    ज़रा सा ही मगर हम भी चलो बदनाम होते हैं

    तुम्हें ये भी नहीं मालूम कितनी है हमें चाहत
    दिलाना भी यक़ीं चाहें मगर नाकाम होते हैं
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    Umashankar Lekhwar
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    मिली अब जो नज़र तुमसे तो मैं सब भूल जाऊँगा
    बताओ अब मुझे आख़िर तुम्हें मैं क्यों निहारूँगा

    इन्हीं से हूँ अभी ज़िंदा इन्हीं में जी रहा हूँ मैं
    बिताए थे कभी हमने वो लम्हें क्यों भुलाऊँगा

    निशानी जो अगर माँगे कभी मुझसे मोहब्बत की
    सिवाए ख़्वाब के आख़िर किसी को और क्या दूँगा

    बिना देखे मुझे कैसे मेरा तुम हाल जानोगी
    मिलोगी तुम कभी आकर तुम्हें मैं तब बताऊँगा

    तुम्हें ही ढूँढ़ता है ये तुम्हें क्यों चाहता है ये
    मेरा दिल नासमझ है अब इसे मैं क्या सजादूँगा

    न मैं अब याद करता हूँ न तुम भी याद आते हो
    अगर यूँ ही गुज़ारे दिन तुम्हें मैं भूल जाऊँगा
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    Umashankar Lekhwar
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    किसी को क्या ख़बर कैसे बिता लेते हैं अपने दिन
    बिना उनके कि जिनपर वो हर इक दिन हक़ जताते थे
    Umashankar Lekhwar
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    सजाया तो उसे होगा मगर अब ये तमन्ना है
    निहारूँ मैं उसे फिर आज रंगों से सजाकर के
    Umashankar Lekhwar
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    "भूल जाऊँगा मैं"
    मैं भूल रहा हूँ वो बातें, जो शायद
    हुई थी तुझसे, मेरे एक ख़्वाब की तलाश में
    ख़्वाब वो जिनके साथ गुज़री थी मेरी शामें
    मैंने भुला दिया है तुझे, ज़माने में मसरूफ़ रह कर
    हाँ, जब कभी मैं तन्हा होता हूँ
    तो वो तन्हा शामें, मेरी ये बेसब्र आँखें
    ढूँढ़ती है तुझे, बीते उन लम्हों में कहीं
    जो गुज़ारे थे मैंने तेरे ख्वाबों के साथ
    अक्सर रात होने तक, मैं पाता हूँ
    ख़ुद को उलझा हुआ तेरी यादों में कहीं
    गुज़र जाएँगे ये दिन भी यूँ ही
    जैसे गुज़ार दिए कुछ तेरी दीवानगी में
    ये तन्हाई तुझे याद तो करती है
    मगर गुज़रते रहे जो ये दिन यूँ ही
    तो तुझे, भूल जाऊँगा मैं
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    Umashankar Lekhwar
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    वो घूमती मुझको दिखी तो मैं सवालों में रहा
    थी तो वही मैं रातभर जिसके ख़यालों में रहा

    अब तक समेटे है कि ख़ुश्बू वो फ़िरे है हर दिशा
    वो एक दिन जो फूल बस कुछ देर बालों में रहा
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    Umashankar Lekhwar
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