तू ख़याल रख अपना मैं ख़याल रख लूँगा
है तुझे मोहब्बत तो मैं मिसाल रख लूँगा
है तुझे मोहब्बत तो मैं मिसाल रख लूँगा
मैं अगर तुझे दूँगा जो जवाब भी अपने
तो तेरे भी होंठों पे मैं सवाल रख लूँगा
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रूठ सा गया है कुछ मुझ से ये नज़ारा भी
रह गया न ख़्वाबों में अब मेरे सितारा भी
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ख़ुश-नसीबी है ये टीके की कि माथे पे सजा है
ये मेरी है बद-नसीबी क्यूँ वहाँ ये लब नहीं हैं
नींद मुझ को आ भी जाएगी मगर फिर ये सितम है
वो वहाँ भी आ रही है ख़्वाब उस के कब नहीं हैं
चाहते हैं जो तुम्हें सब और तुम को ये गुमाँ है
ख़ैर देखो वो सभी के हैं तुम्हारे सब नहीं हैं
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मेरे वो ऐब हर इक दिन उसे भी तो सताते थे
जिसे भी पूछता था, वो ग़लत उस को बताते थे
जिसे भी पूछता था, वो ग़लत उस को बताते थे
मिला जब भी उसे, फिरता रहा हर रोज़ आवारा
मुझे मिल ही न पाए रास्ते जो उस को जाते थे
उसे भी याद करता मैं, निशानी हो अगर कोई
सँभाले हैं अभी तक वो मुझे जो ख़्वाब आते थे
अगर वो फिर कभी आए ख़यालों में तो पूछूँगा
तेरे वो ख़्वाब अब तक किस लिए मुझ को जगाते थे
किसी को क्या ख़बर कैसे बिता लेते हैं अपने दिन
बिना उन के कि जिनपर वो हर इक दिन हक़ जताते थे
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लुटा देते हैं सब अपना जिन्हें कुछ मिल नहीं पाता
बुरा कहते उन्हें है लोग, जो नाकाम होते हैं
दिखाते हैं उन्हें जब लोग अपनी कामयाबी को
कहाँ जाते हैं वो, जो शख़्स फिर नाकाम होते हैं
उन्हें सब जानते हैं और उन का नाम लेते हैं
मिले मंज़िल अगर तो नाम, या बदनाम होते हैं
हमें इक शख़्स जो वो मिल न पाया, नाम से उस के
ज़रा सा ही मगर हम भी चलो बदनाम होते हैं
तुम्हें ये भी नहीं मालूम कितनी है हमें चाहत
दिलाना भी यक़ीं चाहें मगर नाकाम होते हैं
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कौन होगा जिस किसी के ख़्वाब में फिर तू न आए
नींद भी उड़ जाए उस की जो किसी को तू बुलाए
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किसी को क्या ख़बर कैसे बिता लेते हैं अपने दिन
बिना उन के कि जिनपर वो हर इक दिन हक़ जताते थे
बिना उन के कि जिनपर वो हर इक दिन हक़ जताते थे
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सजाया तो उसे होगा मगर अब ये तमन्ना है
निहारूँ मैं उसे फिर आज रंगों से सजाकर के
निहारूँ मैं उसे फिर आज रंगों से सजाकर के
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"भूल जाऊँगा मैं"
मैं भूल रहा हूँ वो बातें, जो शायद
हुई थी तुझ से, मेरे एक ख़्वाब की तलाश में
ख़्वाब वो जिन के साथ गुज़री थी मेरी शा
में
मैं ने भुला दिया है तुझे, ज़माने में मसरूफ़ रह कर
हाँ, जब कभी मैं तन्हा होता हूँ
तो वो तन्हा शा
में, मेरी ये बेसब्र आँखें
ढूँढ़ती है तुझे, बीते उन लम्हों में कहीं
जो गुज़ारे थे मैं ने तेरे ख़्वाबों के साथ
अक्सर रात होने तक, मैं पाता हूँ
ख़ुद को उलझा हुआ तेरी यादों में कहीं
गुज़र जाएँगे ये दिन भी यूँ ही
जैसे गुज़ार दिए कुछ तेरी दीवानगी में
ये तन्हाई तुझे याद तो करती है
मगर गुज़रते रहे जो ये दिन यूँ ही
तो तुझे, भूल जाऊँगा मैं
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ख़्वाब वो जिन के साथ गुज़री थी मेरी शा
में
मैं ने भुला दिया है तुझे, ज़माने में मसरूफ़ रह कर
हाँ, जब कभी मैं तन्हा होता हूँ
तो वो तन्हा शा
में, मेरी ये बेसब्र आँखें
ढूँढ़ती है तुझे, बीते उन लम्हों में कहीं
जो गुज़ारे थे मैं ने तेरे ख़्वाबों के साथ
अक्सर रात होने तक, मैं पाता हूँ
ख़ुद को उलझा हुआ तेरी यादों में कहीं
गुज़र जाएँगे ये दिन भी यूँ ही
जैसे गुज़ार दिए कुछ तेरी दीवानगी में
ये तन्हाई तुझे याद तो करती है
मगर गुज़रते रहे जो ये दिन यूँ ही
तो तुझे, भूल जाऊँगा मैं
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