मेरे वो ऐब हर इक दिन उसे भी तो सताते थे
जिसे भी पूछता था, वो ग़लत उस को बताते थे
मिला जब भी उसे, फिरता रहा हर रोज़ आवारा
मुझे मिल ही न पाए रास्ते जो उस को जाते थे
उसे भी याद करता मैं, निशानी हो अगर कोई
सँभाले हैं अभी तक वो मुझे जो ख़्वाब आते थे
अगर वो फिर कभी आए ख़यालों में तो पूछूँगा
तेरे वो ख़्वाब अब तक किस लिए मुझ को जगाते थे
किसी को क्या ख़बर कैसे बिता लेते हैं अपने दिन
बिना उन के कि जिनपर वो हर इक दिन हक़ जताते थे
— Umashankar Lekhwar















