मिली अब जो नज़र तुम सेे तो मैं सब भूल जाऊँगा

बताओ अब मुझे आख़िर तुम्हें मैं क्यूँ निहारूँगा

इन्हीं से हूँ अभी ज़िंदा इन्हीं में जी रहा हूँ मैं
बिताए थे कभी हम ने वो लम्हें क्यूँ भुलाऊँगा

निशानी जो अगर माँगे कभी मुझ से मोहब्बत की
सिवाए ख़्वाब के आख़िर किसी को और क्या दूँगा

बिना देखे मुझे कैसे मेरा तुम हाल जानोगी
मिलोगी तुम कभी आ कर तुम्हें मैं तब बताऊँगा

तुम्हें ही ढूँढ़ता है ये तुम्हें क्यूँ चाहता है ये
मेरा दिल नासमझ है अब इसे मैं क्या सजादूँगा

न मैं अब याद करता हूँ न तुम भी याद आते हो
अगर यूँ ही गुज़ारे दिन तुम्हें मैं भूल जाऊँगा

— Umashankar Lekhwar

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